
समीक्षक- हरिशंकर शर्मा जी
(पं राधेश्याम कथावाचक शोध केंद्र, जयपुर)
कविता लिखना और कविता को जीना दोनों अलग अलग मार्ग हैं।जो कविता लिखते लिखते कविता जीना सीख गया,उसी की कविता सिर चढ़कर बोलती है।आज के दौर में नवोदित रचनाकार येन-केन प्रकारेण लिखकर रातों रात महाकवि होने का स्वप्न देखने लगते हैं।वह यह भूल जाते है ज्यों ज्यों कवि बूढ़ा होता है उसकी कविता जवान होती जाती है।आज महानगरों में जो कविताएं पढ़ी लिखी जा रही है वस्तुतः उसमें कंक्रीट के पहाड़ तो हैं लेकिन मिट्टी की सुगंध नहीं। कविताओं की सपाट बयानी और अतुकांत से उसकी मिठास पीछे छूट गयी है।आज कविताओं में न गांव हैं और ना लोक जीवन से जुड़े पर्व त्यौहार। वर्तमान में सनातन के शोर में कुछ कवि धर्म अध्यात्म और संस्कृति का स्वर घोल रहे हैं।दोहा लिखने को क्या छंद की वापसी माना जाए? वर्तमान कविता पर नए सिरे से लिखने की आवश्यकता है।इधर नए पौधे कविता के तैयार भी हो रहे हैं,यह प्रसन्नता का विषय है कि सबसे अधिक काव्य संग्रह ही प्रकाशित हो रहें हैं।
एक ऐसा ही काव्य संग्रह शीर्षक – ‘अर्तम’ (माथे पर सुनहरा कमल) दिव्या सक्सेना (शोधार्थी) के द्वारा लिखित, हिंदी अकादमी, नई दिल्ली के सौजन्य से वेरा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है।यह संग्रह छोटी बड़ी कविताओं से सुसज्जित है। कवियत्री के लेखन में वैचारिक परिपक्वता, संवेदना की सम्पन्नता तथा शब्दों में भावनात्मक पहलुओं के साथ साथ चिन्तन की ठोस भूमिका भी मौजूद है।
अर्तम शीर्षक पर सबसे अंतिम कविता है जो यह दर्शाता है कि- अंत: अस्ति प्रारंभ:,जिसका अर्थ है अंत ही शुरूआत है।अर्तम अर्थात माथे पर सुनहरा कमल -यह बिम्ब भारतीय सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है।इन कविताओं में पवित्र जागरण और आत्मबोध ही नहीं, अपितु आत्म सम्मान, तेजस्विता और आध्यात्मिक उत्कर्ष का संदेश भी है। काव्य संग्रह की कविताएं ‘शिवत्व’ प्रतीक का प्राण बिंदु है। इसमें जीवन के संघर्ष और हला हल का कोलाहल भी है।इन कविताओं का अंतिम सत्य जीवन के सूक्ष्म क्षणों की यात्रा में विस्तार करना है। संवेदनाओं की परतें, रिश्तों की आंतरिक ऊर्जा तथा स्त्री मन की पीड़ाओं के साथ साथ उसके अंतर में छिपी उस अदम्य शक्ति को काव्य भूमि में सजीव हो उठी भी हमें नज़र आती है – जैसे जब वह निजी जिंदगी के द्वंद्व पर लिखती हैं
” मिलन के सौभाग्य से ज्यादा
मैं विभाजन के दुर्भाग्य को देख
व्यथित और विचलित होती हूं”(पृष्ठ:१३)
जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव पर-
“पीड़ा में अभ्यस्त
होते होते
वह काट लेती है
अपनी ही जीभ को
और गुज़रती है
अंतर्द्वंद्व से
मौन रहकर”(पृष्ठ:२२)
इन कविताओं में सच कहने का साहस है –
“सुंदर है वे हाथ जो लिखते हैं
सृजन करते हैं शब्दों को
प्रतिबद्ध रहते हैं
लिखने को सच हर क्षण”
(पृष्ठ:९३)
इस तरह कवयित्री ने संवेदनाओं को नए अंदाज़ में लिखा है।जीवन की जटिलताओं में भी उन्होंने जीवन का नया गीत गुनगुनाया है। यहां जीवन के समीकरण में हार नहीं मानी हैं। संघर्ष,प्रतीक्षा और दुविधा के त्रिकोण में भी आनन्दानुभूति और जीने का सलीका भी दर्शाया है। इसमें कई प्रतीक निजता की परिभाषा भी गढ़ते दिखाई देते हैं – जैसे
” मानव मन को ना जाने
क्या क्या सहना
क्योंकि नियति है बंधनों से परे
जो रच दिया उसने
हो वहीं करे “(पृष्ठ:१२८)
अर्धनारीश्वर एवं शिवमय होना एक ही मिजाज की कविताएं हैं और इसमें लक्ष्य निर्धारित है- ‘ शिव में ही रमे रहने का’। मृत्यु और समाधि के मध्य आत्म-मंथन करने की आवश्यकता को भी दर्शाया है-
” हे मानव! ना डर ,ना बिखर
किसी भी बात से क्योंकि
मिलता नहीं कुछ भी
आसानी से संसार में “
(पृष्ठ:१२५)
गंतव्य, यात्रा में,बूंद और सागर,मन के वीराने में आदी जीवन की निजता और संघर्ष का राग है। जीवन यात्रा में रंगत बदलने पर मृत देह में जैसे प्राणों का संचार होता है।इसी तरह कवयित्री ने जीवन संघर्षों को प्रतीकों के माध्यम से सरल शब्दों में पिरोया है कुछ इस तरह- ” एक अंतहीन सत्य पर अनसुना
शायद वह ताउम्र नहीं रहेगी पार्थ
जिंदगी के युद्ध से लड़ते हुए
वह गढ़ेगी एक अभिमन्यु!
(पृष्ठ:११८)
‘अर्तम’ का अर्थ ज्ञान, समृद्धि और उद्देश्य है। अतः यह कविताएं अपनी बनावट में जीवन का महत्व, ऐश्वर्य, सौभाग्य का अर्थ पूर्ण उद्देश्य लेकर चली हैं। सत्यं शिवम् सुंदरम् के मूल्य मंत्र को लेकर चलने वाली कवियत्री दिव्या सक्सेना का काव्य मन ‘शिवत्व’ की नई व्याख्या गढ़ता है।शिव के प्रति विशेष आस्था इन कविताओं में प्रखर रुप से मौजूद दिखाई देती है। हिमालय, ताण्डव, पुनः मृत्यु लोक पर,अहं ब्रह्मास्मि,प्रेम की अभिलाषा,शिव शक्ति, मैं विनाशी भी,हिमावत,बनारस,निर्वाण,प्रेम और रुद्राक्ष, संकल्प की शक्ति, शिवोहम्- शिवोहम्, ओंकार नाथ,तुम हो क्या?,सीख आराध्य शिव से, शक्ति का शिव से संवाद आदि इन कविताओं में ठोस शैव दर्शन पर आधारित ना होकर बल्कि हमारे यथार्थ बोध पर ज़्यादा केंद्रित है। ताण्डव कविता में भावों के प्रतीकात्मक महत्व में नारी के स्वाभिमान पर उठे प्रश्न को चिह्नित किया है।
शिव शक्ति काव्य में – “द्वंद्व यदि पार्वती ने सहा ज्ञान अज्ञान के मध्य,तो शिव भी रहे मन ही मन विचलित” (पृष्ठ: २६)
इसमें गहरे संबंध के प्रति एकरुपता का सुंदर चित्रण प्रस्तुत किया है।
‘हिमावत’ कविता में जीवन संघर्ष और चुनौतियों के मैदान पर भी डटे रहने का दृढ़ संकल्प दर्शाया है तथा समाज को पारिवारिक पृष्ठभूमि पर एकता के साथ मजबूती से खड़े रहने का संबल भी दर्शाया है- ” हो जाएं हिमावत
समाज में हर पिता अगर
बेटियां सशक्त होकर
तब पहुंचेंगी
शिखर
पर।
(पृष्ठ:३०)
प्रतिरोध के मार्ग पर भी तटस्थ होकर चलने वाली स्त्री का आत्मबल कुछ इस तरह स्वयं के लिए पथ प्रदर्शक बनता है –
“संकल्प है मेरा
अब अबला ना रहूं
क्योंकि मैं एक
सशक्त स्त्री हूं”(पृष्ठ:३४)
इन कविताओं में एक स्त्री समुद्र होने की अभिलाषा रखती है और कहीं नदी होना भी स्वीकारती है क्योंकि संगम का आनंद प्रकृति ने समुद्र और नदी के हिस्से में ही रखा और इस संकल्प की पूर्णता में पवित्र उद्देश्य समाहित है – इस पर वह लिखतीं हैं ” संकल्प हो तो शिव सा और पूर्ण हो वह शक्ति सा”
इसमें अद्वैत मार्ग ध्वनि हुआ है।
इस योग में प्रतीकों की उलटवासी और जीवन में अमृत की तलाश को भी भरपूर दर्शाया गया है।जब यह अश्रु पूर्ण जीवन रुद्राक्ष हो जाए तो जीवन एक अलग मुकाम हासिल कर लेता है।वरना संघर्ष और चुनौतीपूर्ण हालातों में उपजे अतृप्त भाव ही जीवन में रण समान है।यह ‘रण में हम’ कविता में स्पष्ट ध्वनित है। जीवन में जीवन साथी के सहयोग से अंतर यात्रा में जीवन एक मानसरोवर तीर्थ बनता है। लेकिन कवयित्री अपने लेखन में इच्छाओं और कर्तव्य के मध्य कैलाश की तरह तटस्थता के महत्व को भी दर्शाती हैं। इन पंक्तियों में यह स्पष्ट रुप से उभरता है –
” सुखद है, सहयात्री होना
मगर चुनौतियाॅं भी
कुछ कम नहीं “(पृष्ठ:६१)
वह लिखतीं हैं -क्या भला कुआं और तलाब का कभी संगम हुआ है ? नदी ही समुद्र तक पहुॅंचती है- नदी का उद्देश्य भिन्न है और संसार में संतुलन बनाए रखना ही उद्देश्य।नदी की इस अनंत यात्रा को दर्शाता कवयित्री का मन – ‘दिव्य प्रेम’ कविता के रुप में अवतरित होता है
साकार होकर
उस निराकार के अंश का हिस्सा बनकर…”
इस काव्य संग्रह में अन्य कविताएं जैसे मिट्टी,जियो और जीने दो,सफलता का स्वेटर,मानवता की पुकार,मेरे निश्छल मन की गति को देखों, धुआं धुआं आदि अपने आप में एक नई पृष्ठभूमि का निर्माण करती हैं जो समकालीन समय में प्रासंगिक भी है।
भाषा के धरातल पर यह कविताएं अपने कमज़ोर पक्ष को भी संभाल लेती हैं ।कुल मिलाकर यह काव्य संग्रह ‘अर्तम’ (माथे पर सुनहरा कमल) कवियत्री के लेखन जीवन की यात्रा का एक पड़ाव है।आगे यात्रा निरंतर चलती रहे इसके लिए यह संग्रह स्वागत करने योग्य हैं।
ये रचनाएं भी पढ़ें-
प्रयागराज: जहाँ जल भी मोक्ष का द्वार बनता है
धागों से रिश्तों तक
…अगर ज़िंदगी फिर से मुड़ जाए
मैं मुक्त होना चाहती हूँ……

2 thoughts on “‘अर्तम’ काव्य संग्रह समीक्षा: दिव्या सक्सेना की संवेदनशील कविताएं”