
पूजा पिपलीवाल, शिक्षिका, नीमच (मध्यप्रदेश)
हर लड़की जन्म से बेटी होती है।
उसकी पहचान उसके नाम से होती है, उसकी हँसी से होती है, उसके सपनों से होती है।
लेकिन शादी के बाद जैसे ही वह ससुराल की चौखट पार करती है, उसकी पहचान बदल दी जाती है।
कोई पूछता भी नहीं -“क्या तुम तैयार हो?”
उसे बताया जाता है –
“सर पर पल्ला रखो… अब तुम बेटी नहीं, बहू हो।”
“ज़्यादा मत बोलो… बहू को चुप रहना शोभा देता है।”
“अकेले बाहर मत जाओ… बहू हो तुम।”
“अपनी राय मत दो… जैसा घर वाले कहें वैसा करो।”
धीरे-धीरे वह लड़की अपने ही भीतर से गायब होने लगती है।
वह अपने स्वभाव को तह करके अलमारी में रख देती है।
अपने सपनों पर पर्दा डाल देती है।
अपनी आवाज़ को धीमा कर देती है।
वह सीख जाती है
कैसे चलना है,
कैसे बैठना है,
कैसे बोलना है,
और कब चुप रह जाना है।
वह खुद को “बहू” के साँचे में ढाल लेती है।
अब वह बेटी नहीं रही… वह बहू है।
फिर समय बदलता है…
वक्त का पहिया घूमता है।
सास-ससुर वृद्ध होते हैं।
बीमार पड़ते हैं।
बिस्तर पर लग जाते हैं।
और फिर वही आवाज़ सुनाई देती है
“बहू, ज़रा पास आओ… तुम भी तो बेटी ही हो।”
“हमें डॉक्टर के पास ले चलो… राय तो दो, तुम भी तो बेटी हो।”
“अपने हाथ से खाना खिला दो… बेटी जैसी हो तुम।”
“हमसे बातें किया करो… तुम तो हमारी बेटी हो।”
उस दिन वह ठिठक जाती है।
सोचती है
मैं बेटी कब थी?
जब अपनी राय देना चाहती थी, तब मैं बहू थी।
जब अपने सपनों की बात करती थी, तब मैं बहू थी।
जब घर से बाहर कदम रखना चाहती थी, तब मैं बहू थी।
और आज जब सेवा चाहिए, सहारा चाहिए,
तो मैं बेटी हो गई?
सच क्या है?
बेटियाँ मुलायम होती हैं लोनी सी, मिट्टी सी।
उन्हें प्रेम से सींचा जाता है।
उनकी गलतियाँ भी मुस्कराकर स्वीकार की जाती हैं।
बहू को तराशा जाता है
उससे उम्मीदों का पहाड़ बाँध दिया जाता है।
उसकी हर बात पर कसौटी रखी जाती है।
कितना भी कर लो
बहू कभी बेटी नहीं बन सकती,
जब तक उसे बेटी की तरह अपनाया न जाए।
समाज का दस्तूर अजीब है।
बहू को बेटी नहीं माना जाता,
लेकिन ज़रूरत पड़ने पर उसे बेटी कहकर सेवा ले ली जाती है।
बदलना कहाँ है?
बदलाव बहू में नहीं चाहिए,
बदलाव सोच में चाहिए।
पहले बहू को बेटी का स्थान दीजिए
उसकी बात सुनिए,
उसे निर्णय में शामिल कीजिए,
उसे अपनेपन का अधिकार दीजिए,
उसकी गलती पर भी वही धैर्य रखिए जो बेटी पर रखते हैं।
फिर देखिए
बहू से बेटी बनने में कभी कठिनाई नहीं होगी।
बेटी से बहू बनने में शायद समय लगता है,
लेकिन बहू से बेटी बनने में केवल एक चीज़ चाहिए
सच्चा अपनापन।
क्योंकि रिश्ता नाम बदलने से नहीं,
दिल बदलने से बनता है।

Bahut acchi aur sacchai ko bayan karti rachna