
पूनमसिंह, प्रसिद्ध लेखिका, मेरठ
वो मिट्टी की खुशबू,
वो चूल्हे का धुआँ,
वो पंछियों की चहचहाहट,
वो पनघट, वो कुआँ।
गुम हो गए जाने कहाँ, कब, कैसे
जब से गाँव शहर हुआ।
हाँ, बना तो लिए हैं पक्के मकान,
पर रिश्तों में इंसान कच्चा हुआ।
अब फ़ुर्सत ही नहीं मिलकर बैठने की,
जब से गाँव शहर हुआ।
दबकर रह गई रिश्तों की गर्माहट,
स्वार्थ का हौसला बुलंद हुआ।
मतलब हुआ तो ग़ैर भी अपना,
वरना अपना भी ग़ैर हुआ
हाँ, जब से गाँव शहर हुआ।