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शहर बनते गाँव का दृश्य, जहाँ पक्के मकानों के बीच अकेलापन और रिश्तों की दूरी दिखती है

मिट्टी की खुशबू रोती रही

यह कविता गाँव से शहर बने समाज की उस पीड़ा को उजागर करती है, जहाँ पक्के मकानों के बीच रिश्ते कच्चे होते चले गए। मिट्टी की खुशबू, चूल्हे का धुआँ और अपनापन सब कुछ शहरी भीड़ में कहीं खो सा गया है।

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