प्रदूषित शहर में झोपड़ी के पास खड़ी महिला धुएँ से भरे आसमान को देखते हुए

ज़हरीली हवाएँ

रीमा धुएँ और धूल से भरे आसमान को निहारते हुए सोचती है—क्या स्वच्छ हवा केवल ऊँची इमारतों में रहने वालों का अधिकार है? झोपड़ियों में रहने वाले लोग भी तो उसी धरती और हवा का हिस्सा हैं। एक नन्हा पौधा उसे उम्मीद देता है कि अगर हम चाहें, तो ज़हरीली हवाओं के बीच भी जीवन को बचाया जा सकता है।

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शहर बनते गाँव का दृश्य, जहाँ पक्के मकानों के बीच अकेलापन और रिश्तों की दूरी दिखती है

मिट्टी की खुशबू रोती रही

यह कविता गाँव से शहर बने समाज की उस पीड़ा को उजागर करती है, जहाँ पक्के मकानों के बीच रिश्ते कच्चे होते चले गए। मिट्टी की खुशबू, चूल्हे का धुआँ और अपनापन सब कुछ शहरी भीड़ में कहीं खो सा गया है।

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वो गाँव की कच्ची सड़क…

गाँव के बदलते स्वरूप और उसमें आने वाले शहरीकरण की भावनात्मक तस्वीर पेश करती है। कच्ची सड़कें अब काली, चौड़ी और बदल चुकी हैं, दोनों तरफ हरियाली से लहलहाते खेत अब दुकानों और व्यावसायिक स्थलों में बदल गए हैं। गाँव के लोग और उनकी सरल जीवनशैली धीरे-धीरे शहरी अंदाज़ और मुखौटे में बदल रही है। सुनार की जगह ज्वैलर्स, भड़भूजे और चने की जगह पॉपकॉर्न जैसी चीजें गाँव में जगह लेने लगी हैं। जबकि यह विकास और सुविधा का प्रतीक है, कवि अपने पुराने प्यार और ग्रामीण सादगी को याद करता है और मन में कचोट अनुभव करता है।

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