
निरुपमा सिंह, प्रसिद्ध लेखिका
गुड़ वाली चाय और मैं
दोनों ही
थोड़ी देसी,
थोड़ी अनगढ़,
और पूरी तरह
ईमानदार।
चीनी जैसी
चमक-दमक नहीं मुझमें,
मेरी मिठास
धीरे खुलती है
जैसे गुड़
उबलते पानी में
अपना रंग छोड़ता है,
वैसे ही
मैं समय लेकर
अपनी बात कहती हूँ।
सुबह की थकन हो
या शाम की चुप्पी,
गुड़ वाली चाय
मुझे अपने पास बैठा लेती है।
कुल्हड़ की गर्माहट में
मैं खुद को
थोड़ा कम कड़वा,
थोड़ा ज्यादा सहज
पाती हूँ।
इस चाय में
कोई बनावट नहीं
बस दूध,
पानी,
पत्ती
और गुड़।
जैसे मेरे जीवन में
कुछ रिश्ते,
थोड़ा संघर्ष,
और भीतर छुपी
सीधी-सी मिठास।
गुड़ वाली चाय
मुझे याद दिलाती है
कि सादगी भी
स्वाद बन सकती है।
कि हर मीठा
चमकदार होना ज़रूरी नहीं।
और शायद
इसीलिए
गुड़ वाली चाय और मैं
एक-दूसरे को
खूब समझते हैं।
वाह बेहतरीन चाय,गुड और उसकी मिठास
वाह