
रश्मि मृदुलिका, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखण्ड)
किरन अपनी शर्तों पर जीने वाली लड़की थी। शुरू से ही जो उसे सही लगता, वही करती। बेफ़िक्र, खुशदिल और जीवंत अपने परिवार और पड़ोस में वह इसी पहचान से जानी जाती थी। बच्चे हों या बुज़ुर्ग, हर किसी से उसकी सहज मित्रता थी।
पढ़ने में होशियार थी, इसलिए जल्दी ही एक मल्टीनेशनल कंपनी में उसकी नौकरी लग गई। अच्छी सैलरी, अच्छा वातावरण जीवन खूबसूरती से आगे बढ़ रहा था।
इसी दौरान उसकी मुलाक़ात साहिल से हुई। साहिल का व्यक्तित्व संतुलित, गम्भीर और समझदार था। किरन उसके स्वभाव से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी। देखते ही देखते दोनों ने विवाह बंधन में बंधने का निर्णय ले लिया। परिवार वालों को भी यह रिश्ता बिल्कुल उपयुक्त लगा, इसलिए घर में उत्साह और तैयारी शुरू हो गई।
विवाह की तैयारियाँ जोरों पर थीं। घर में हर तरफ हँसी, रोशनियाँ और रौनक थी। लेकिन पता नहीं क्यों, किरन के मन में एक अजीब-सी उदासी घर करती जा रही थी। सब कुछ उसके मन के अनुसार हो रहा था, फिर भी भीतर एक बेचैनी थी जिसे वह समझ नहीं पा रही थी।
माँ-पिताजी को देखते ही वह बेचैनी और गहरी हो जाती।
अपने कमरे में रखी अपने हाथों से बनाई पेंटिंग, पुराना फूलदान, कुछ बचपन के खिलौने सब देखकर उसका मन भर आया। यह वही कमरा था जहाँ उसने हँसते-खेलते अपना पूरा बचपन बिताया था। माँ की मनुहार, पिता का दुलार, भाई-बहन की नोक-झोंक सब मानो पीछे छूटते जा रहे थे।
आख़िर क्यों एक बेटी को अपने माता-पिता से दूर जाना पड़ता है?
कैसा रिवाज़ है यह? कैसी प्रथा?
एक बेटी और उसके माता-पिता का दर्द कौन समझ सकता है?
वही माँ जो उसे एक-एक निवाला खिलाती थी…
वही पिता जिसे उसकी ज़रा-सी चोट भी बेचैन कर देती थी…
उन्हीं के दिल के टुकड़े को आज विदा करना है।
यह कैसा विरह है जिसमें हँसते हुए रोना पड़ता है और रोते हुए भी मुस्कुराना…
एक तरफ़ सुखद भविष्य बाहें फैलाए खड़ा है, और दूसरी तरफ़ अपनेपन से भरा अतीत विदा माँग रहा है।
किरन की आँखें भर आईं…

हर लड़की के जीवन का सब से मुश्किल पल और यादगार भी । खूबसूरत रचना।
हर लडकी की सच्चाई को व्यक्त करती सुंदर सृजन