
मेघा अग्रवाल, प्रसिद्ध लेखिका, नागपुर (महाराष्ट्र)
झमाझम बरसो मेघा तप रही हूँ मैं
देखो, सूख गए खेत–खलिहान,
मासूम-से बैठे हैं किसान।
सब तरफ है सूखा–सूखा,
कहीं नहीं हरियाली है;
तुम नहीं तो धरती पर
दिन और रात की काली है।
झमाझम बरसो मेघा तप रही हूँ मैं।
सूरज ने भी आग उगली,
चारों ओर मचा हाहाकार।
बिन पानी सब कुछ सूना,
फटी–फटी बिखर रही हूँ मैं।
जल-बिन ऐसे तड़प रही हूँ—
बादल, तुम आ जाओ न,
प्यास हमारी बुझाओ न।
झमाझम बरसो मेघा तप रही हूँ मैं।
तुम आओगे तो उपवन खिलेगा,
जग में फिर जीवन पलेगा।
बिन बादल न आए जल,
धरती की तपन मिटाए कौन?
बादल, आओ गले लगाओ,
सूखी धरती फिर लहराओ।
झमाझम बरसो मेघा तप रही हूँ मैं।
