
मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)
विवेक का व्यवहार अब मुझे परेशान करने लगा था। कभी उखड़ा-उखड़ा सा लगता, कभी घंटों एकटक शून्य में ताकता रहता। कभी मुझसे अजीब तरह के प्रश्न करता-
मां, तुम ऑफिस में किस से बातें करती हो ?
क्या तुम्हें अकेलेपन से घबराहट नहीं होती ?
क्या तुम्हें किसी साथी की तलाश है ? …..
उसके इन अजीब से प्रश्नों को सुनकर मैं परेशान हो जाती। कभी झुंझलाती और कभी बिना कोई प्रतिक्रिया दिए वहां से उठ जाती।
अब वह दोस्तों के साथ बाहर घूमने भी नहीं जाता था। अपने आप को जैसे उसने चारदीवारी में बंद कर लिया था। अपने सपनों की उड़ान को अचानक जैसे उसने लगाम लगा दी हो। मेरे पूछने पर वह बस टाल दिया करता था।
कभी मुझे लगता वह मेरी चिंता कर रहा है, कभी लगता मुझ पर शक कर रहा है। बस बार-बार मुझे एक ही बात कहता, “माँ, मैं जल्दी से बड़ा होकर तुम्हारा सहारा बनना चाहता हूँ। तुम्हें किसी और की जरूरत महसूस नहीं होने दूँगा।”
एक दिन ऑफिस से मेरा सहकर्मी मुझे छोड़ने आया। विवेक ने बालकनी से देख लिया। मेरे ऊपर आते ही वह मुझ पर बरस पड़ा और उसने मुझे बहुत भला-बुरा कहा। मैं बहुत रोई, लेकिन मैंने विवेक से कुछ नहीं कहा। मुझे लगा वह मेरे लिए ‘पजेसिव’ हो गया है।
लेकिन नहीं, यह सिर्फ ‘पजेसिव’ होना नहीं था। यह कुछ और था… ” कुछ गहरा, कुछ अँधेरा” जिसे मैं समझ नहीं पा रही थी और वह शायद किसी से कह भी नहीं पा रहा था।
धीरे-धीरे वह मेरी हर गतिविधि पर नजर रखने लगा। मैं तैयार होकर ऑफिस जाती तो कहता, “इतना सज-संवरकर ऑफिस किसके लिए जाती हो?”
मैंने उसकी खुशी के लिए सजना-संवरना छोड़ दिया। ऑफिस की कोई पार्टी होती तो वह कुछ ना कुछ बहाना करके मुझे रोक लेता। मैं इन सब बातों से परेशान तो थी, लेकिन मुझे लगा शायद समय के साथ विवेक समझ जाएगा।
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वक्त के साथ-साथ उसका व्यवहार सुधरने की जगह बिगड़ता ही गया।
एक रात मेरी और उसकी बहुत बहस हुई। उसने कहा, “तुम अकेली औरत हो, समाज तुम पर बुरी नजर रखता है। मुझे बड़ा होने दो, फिर मैं तुम्हें इस घर से बाहर नहीं निकलने दूँगा।”
तब मैंने उसे समझाया, “विवेक, तुम्हारे पापा के जाने के बाद सिर्फ तुम ही मेरी दुनिया हो। तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी है। लेकिन विवेक, अब मैं अपना काम करके स्वयं को व्यस्त रखना चाहती हूँ। वहाँ सबसे मिलकर थोड़ा हँस-बोल लेती हूँ, मेरा दिन बीत जाता है। तुम अभी अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो और बाद में अपनी नौकरी में व्यस्त हो जाओगे। घर में बंद रहना अब मेरे लिए संभव नहीं है।”
मेरी इस बात पर उसे इतनी जोर से गुस्सा आया कि उसके हाथ में जो रिमोट था, उसने मेरे सर पर फेंक कर दे मारा।
मैं हतप्रभ रह गई!
मैं वहां से उठकर दूसरे कमरे में चली गई। थोड़ी देर बाद विवेक आया। मेरी गोदी में सर रखकर फूट-फूट कर रोने लगा। बोला, “माँ, मुझे माफ कर दो। पता नहीं मैं कभी-कभी उलटी-सीधी बातें सोचने लगता हूँ और तुम्हारे साथ बुरा व्यवहार करता हूँ। माँ, तुम मुझे माफ कर दो।”
देर तक मैं और विवेक आंसुओं से एक दूसरे को भिगोते रहे। विवेक उस रात मेरे पास ही सो गया।
अचानक रात में मेरी नींद खुली तो विवेक मेरे पास नहीं था। मैंने सोचा, देखती हूँ, शायद अपने रूम में जाकर सो गया होगा। कमरे के बाहर जाते ही मेरे कदम वहीं ठिठक गए।
लैपटॉप के वायर के साथ विवेक पंखे पर लटका हुआ था।
मेरी चीख मेरे गले में ही जम गई। दुनिया घूम गई। वह मेरी चिंता नहीं कर रहा था… वह मुझ पर शक नहीं कर रहा था…। वह… ” वह बीमार था” । वह एक ऐसी लड़ाई लड़ रहा था जिसे मैं देख नहीं पाई, और वह कह नहीं पाया। मेरी गोद में सिर रखकर रोने वाला मेरा विवेक, अब उस पंखे से बेजान लटका था… और अपने साथ मेरे जीने की हर वजह भी ले गया ।