रोटी की दास्तान

एक पिता जिसने बच्चों के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी, वही बुढ़ापे में भावनात्मक उपेक्षा का शिकार हो जाता है। “रोटी की दास्तान” रिश्तों की सच्चाई को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।

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अधूरी बात, अधूरा जीवन…

शारीरिक बीमारियों का इलाज तो हम कर लेते हैं लेकिन वह बीमारियां जो दिमाग के अंदर ही अंदर पनपतीं रहती हैं, किसी को दिखाई नहीं देती है, सही समय पर उनको पहचान कर, स्वीकार करना और इलाज ना किया जाए तो उनका रूप किस कदर बिगड़ेगा …..
विवेक की मानसिक स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी ।‌ मां को लेकर वह असुरक्षित महसूस करता था । अपनी बात ना मां को ना किसी और को समझा पाया ।
मां उसकी इस बीमारी को समझ तो रही थी लेकिन इससे पहले कि वह इलाज ढूंढती …..

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