Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers

वह अफ़साना…

अश्विन सर, मुझे लेकर, कहां जा रहे हैं ? और क्यों ? छोटा शहर है, किसी ने मुझे इनके साथ देख लिया तो न जाने मेरे बारे में क्या सोचेगा ।
सर, ने मुझे एक एंप्लॉय से ज्यादा दोस्त समझा, मुझ पर विश्वास किया, और अपनी कुछ ऐसी बातें शेयर की जो वह शायद किसी और से कह नहीं सकते थे….. लेकिन उन्होंने जो कहा उसे सुनकर मैं सकते में आ गई …….. दोस्त समझा तो सही सलाह देना मेरा फर्ज था

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अधूरी बात, अधूरा जीवन…

शारीरिक बीमारियों का इलाज तो हम कर लेते हैं लेकिन वह बीमारियां जो दिमाग के अंदर ही अंदर पनपतीं रहती हैं, किसी को दिखाई नहीं देती है, सही समय पर उनको पहचान कर, स्वीकार करना और इलाज ना किया जाए तो उनका रूप किस कदर बिगड़ेगा …..
विवेक की मानसिक स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती जा रही थी ।‌ मां को लेकर वह असुरक्षित महसूस करता था । अपनी बात ना मां को ना किसी और को समझा पाया ।
मां उसकी इस बीमारी को समझ तो रही थी लेकिन इससे पहले कि वह इलाज ढूंढती …..

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