दीवार

रीता मिश्रा तिवारी, प्रसिद्ध लेखिका, भागलपुर (बिहार)

महंगे झूमर और तस्वीरों से सजे हॉलनुमा कमरे में आराम कुर्सी पर गुमसुम बैठे रविन्द्र की सजल निगाहें एक तस्वीर को अपलक निहार रही थी।

कड़ाके की ठंड और जलती अंगीठी होने के बावजूद उनके माथे पर पसीने की बूंदे झिलमिल सितारों सी चमक रहे थे।

बेचैनी से कभी उठकर चहलकदमी करते कभी तस्वीर के सामने खड़े हो दीवारों पर मुक्का मरते।

ये सब देखकर शंभू (रविन्द्र का पीए) कराह उठा..”क्या सोचते रहते हैं सर…? और कितना दर्द सहेंगे आप..? जो होना था हो गया इसमें किसी का बस नहीं चलता ऊपर वाले की मरजी चलती है ।”

“मैं..क्या करूं..?”

“ऑफिस जाना शुरू करिए सब ठीक हो जाएगा ।
कॉफी भी ठंडी हो गई दूसरी बना लाते हैं..।”

“आप जानते हैं शंभू..! दूसरों के घरों में झाड़ू बर्तन करके माँ ने मुझे पढ़ाया लिखाया किसी चीज की कभी कोई कमी नहीं होने दी..!
खुद भूखी रहती पर मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया..!
मेरे बीमार होने पर रात रात भर जागती दवाई देती थी।
हल्की खांसी होने पर गरम तेल की मालिश करती थी।
कभी गरीबी का एहसास तक नहीं होने दिया।
बाबा को सिर्फ़ पैसा चाहिए था पीने के लिए। और एक दिन शराब ने उनकी जान ले ली।
खुद से वादा किया था मैंने.. माँ को कभी कोई तकलीफ नहीं दूंगा..!
उन के सारे सपने पूरे करूंगा।
सारे कष्ट दूर कर उन्हें सुख और ऐशो आराम की जिंदगी दूंगा।
सब मेरी गलती है शंभू..! पैसा नाम शोहरत कमाकर क्या मिला..कुछ भी नहीं.! बर्बाद हो गया मैं..!
आपको पता है मां का सपना था कि मैं बहुत बड़ा आदमी बनूं। देश में मेरी नाम हो।
गरीबों को अपनी कंपनी में नौकरी दिन उनकी मदद करूं।”

“आपने तो वादा पूरा किया न सर..! माता जी कितनी खुश रहती थी पर होनी को कौन…

“नहीं शंभू होनी नहीं…मैंने अपने और माँ के एक बीच दीवार खड़ी कर दी इसकी वजह से माँ चली गई।
मेरी छोटी सी कराह से माँ मुझे अपने सिने से चिपका लेती थी।
झोपड़ी में दीवार नहीं थी न..!
रात को तकलीफ हुई होगी न माँ को..इस दीवार की वजह से पता नहीं चला मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया..!
मकान में चारदीवारी होनी चाहिए घर में दीवार नहीं ।
शंभू..! कभी भी कमरों के बीच दीवार मत खड़ी करना कभी नहीं_कभी नहीं।

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