
अरुणा रावत अरू, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
नहीं होता इंतज़ार, जिनके आने पर यक़ीं होता,
बस रहता है हर लम्हा ख़याल उनका, जिन्हें हमारा ख़याल नहीं होता.
सोचती रहती हैं ये दो आँखें दिन-रात बस उनको,
सोने का भी ध्यान इन्हें नहीं होता.
न करता है दिल सजने-सँवरने का, गेसू भी बिखरे रहते हैं,
हूँ मैं ख़ुद में या उनमें जाने कहाँ गुम-सी हूँ, यह इल्म नहीं होता.
कीजिए सरकार, चाहे जो कीजिए आपको हक़ है बे-ख़याली का,
हम क्या करें अपनी मोहब्बत का इख़्तियार हमारा इस पर नहीं होता.
इंतज़ार फिर भी न करेंगे यक़ीनन आपका,
नहीं होता यक़ीन आपके न आने का क्योंकि ये दिल अब बेसबर नहीं होता.
आइएगा आप अपनी ़फुर्सत देखकर,
होगी न कोई शिकायत देख लीजिएगा, लबों पर कोई ङ्गउ़फफ न होगी.
कोई ़फर्क़ नहीं पड़ता आपको रूठ जाने का मेरे
हमसे भी ये रूठना-मनाना नहीं होता.
सुंदर कविता