सुनहरा छाता

दिव्या सिंह, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली

गुलाबी सर्दी का मौसम था…कई दिनों से हल्की बारिश भी थी…एक बड़े और आलीशान बंगले में दिव्यांशी अकेली ही थी। पति पेशे से इंजीनियर था। दोनों के रूटीन का कोई तालमेल नहीं था। यही असल मत और मनभेद का सबब भी बन गया था।
शादी को यों तो ज़्यादा दिन नहीं हुए थे, मगर शुरुआत में एक साल वो अपनी नौकरी करती रही। दिव्यांशी वीडियो एडिटर थी, एक निजी समाचार चैनल में। फिर पति की पोस्टिंग के कारण उसे इस्तीफ़ा देना पड़ा। इसके बाद सिलसिला शुरू हुआ दिक्कतों का। दिक़्कतें आर्थिक नहीं थीं. दिक्कत आ रही थी परिवार के साथ सामंजस्य बैठाने में। प्रेम विवाह था। पति के घरवाले साउथ इंडियन थे और हिन्दी–इंग्लिश का ज्ञान न के बराबर था। जब पूरा परिवार साथ बैठता तो अपनी ही भाषा में बातचीत होती, जो दिव्यांशी की समझ से परे थी। थोड़ी देर सुनती रहती फिर खीज कर अपने कमरे में जा Candy Crush खेलने लगती या फिर मायके वालों से फ़ोन पर बात करती, मगर ससुराल की असलियत उनसे बता नहीं पाती, क्योंकि अपनी मर्जी से शादी जो की थी।

पहले ही दिक्कतें कम न थीं, जो मायकेवालों से भी ताने सुनती—
“मना किया था मत करो इस लड़के से शादी…”
तब तो मां–बाप को पागल समझती थी। ये सोच कर ही उसकी रूह कांपती। सब कुछ वो अंदर ही अंदर बर्दाश्त करती। अब उसे इस माहौल में घुटन महसूस होने लगी थी, और यही असल वजह भी थी उनके बीच झगड़े की।

पति शराब का शौकीन था…पत्नी को भी उसने नशे की लत लगा दी। बात शराब तक सीमित नहीं थी.शराब, सिगरेट, हुक्का…सारे शौक दोनों मिलकर ही करते और ज़िंदगी सतरंगी ख़्यालों के साथ गुज़ार रहे थे। पर पति के साथ सजने वाली नशे की इस महफ़िल का किसी तीसरे को पता चले.ये मिस्टर राकेश नहीं चाहते थे। दिव्यांशी अब नशे की बुरी तरह आदी हो चुकी थी। शायद नौकरी छोड़ने और पति पर आश्रित रहने या फिर ससुराल वालों के बर्ताव से बनी घुटन से बचने के लिए उसने नशे को अपनी ज़िंदगी बना लिया था।

अब ऑफिसर्स की होने वाली पार्टियों में भी वो खुले आम जाम पर जाम पीती। ये सब राकेश की बर्दाश्त से बाहर होने लगा। आखिरको था तो मर्द. उसकी मर्जी से पिए तो ठीक, अपनी मर्जी से पी ले तो मर्यादा का उल्लंघन! अब पति–पत्नी के बीच कलेश चरम पर था।

शनिवार की शाम भी दोनों के बीच कुछ इसी बात को लेकर झगड़ा हुआ। दिव्यांशी नहीं चाहती थी कि राकेश उसे घरवालों के साथ छोड़ कर अपने दोस्तों के साथ नाइट–आउट के लिए जाए। मगर राकेश ने नहीं सुनी और बोला—
“चुप…बकवास बंद कर, कमीनी औरत!”
दिव्यांशी को गाली देकर वो तेज़ कदमों से बाहर चला गया।

उसके माता–पिता भी अपने बेटे की ज़्यादा शराब पीने की आदत से परेशान थे, मगर ताने हर बार दिव्यांशी ही सुनती-
“अरे खुद नशेड़ी है, क्या सुधारेगी हमारे बेटे को!”

आज दिव्यांशी के लिए न जाने क्यों ये सब कुछ असहनीय हो गया। दबी ज़ुबान बोली—
“28 साल से बेटा आपका है, आप सुधार नहीं पाए…मुझे तो आए अभी दो बरस भी नहीं हुए…”

ये कहती हुई वो छत पर चली गई। डूबते सूरज को ख़ामोशी से देख रही थी। लग रहा था मानों जाड़ों की ठंडी धूप को नाले के पार के दरख़्त अपने आगोश में कस के जकड़ लेना चाहते हैं…आज़ाद सूरज की किरणों को वो धूलभरी शाखाओं के बंधन में बांध लेना चाहते हैं।

तभी उसकी नज़र लंबी चींटियों की कतार पर पड़ी जो एक गमले की तरफ़ बढ़ रही थी। गमले में एक कुकुरमुत्ते का छाता था, जो हल्का भूरा और काले रंग का था, लेकिन मन्दी धूप की किरण में वो सुनहरे छाते की तरह लग रहा था। उसके नीचे एक नन्ही–सी गौरेया का जोड़ा सर्दी से बचने के लिए पंखों में सिर छुपाए बैठा था। चींटियाँ भी उसी छाते के नीचे, नरम मिट्टी के अंदर जा रही थीं।

ओह…कितने सुकून से इस छाते के नीचे बैठा है जोड़ा…काश इंसान भी प्यार समझ पाता।

राकेश की गाली, ससुराल वालों का बर्ताव और मायके वालों की हिकारत आज सारी चीजें उसे रह–रह कर साल रही थीं। दिल बैठा जा रहा था। वो छत से नीचे परिवार वालों के पास नहीं जाना चाहती थी। किसी को कुछ बताना भी नहीं चाहती थी। बताती भी किसे? कौन सुनता? आँखों से खारा पानी बह–बह कर सूख चुका था। वो एकटक सुनहरे छाते को देखती आगे बढ़ रही थी। वो उसी छाते के नीचे सुकून से बैठना चाहती थी…उस छाते के नीचे गुनगुनी धूप बिना किसी रोक–टोक और बंधन के सेंकना चाहती थी। अब उसे उस सुनहरे छाते के नीचे अपना घर चाहिए था.

…एक ज़ोर की चीख के साथ घर के आस–पास, देखते ही देखते भीड़ जमा हो गई...किसी को कुछ बताना भी नहीं चाहती थी। बताती भी किसे? कौन सुनता? आँखों से खारा पानी बहते-बहते सूख चुका था। वो एकटक सुनहरे छाते को देखती आगे बढ़ रही थी। वही छाता… जिसके नीचे बैठकर उसे सुकून चाहिए था। उस छाते के नीचे गुनगुनी धूप बिना किसी रोक-टोक और बंधन के सेंकने का सुकून। अब उसे उस सुनहरे छाते के नीचे अपना घर चाहिए था।

एक ज़ोर की चीख के साथ घर के आस-पास देखते ही देखते भीड़ जमा हो गई। सायरन बजाती एक एम्बुलेंस आई और किसी के शरीर को उठा कर ले गई। चारों तरफ हाहाकार मच गया। लेकिन उसके घर में , उसके पति के घर में ,जिस घर में आने के लिए उसने अपना आँगन छोड़ा था, अपने माता-पिता, अपने हर खून के रिश्ते से मुँह मोड़ा था… उस घर में सन्नाटा पसर गया।

लोग आ रहे थे… जा रहे थे… मगर खामोश थे।

थोड़ी देर में चीख-पुकार के बीच एक और गाड़ी आई। सभी घर वाले और आने जाने वाले बाहर की तरफ भागे। जो बाहर थे, वो वहीं जिज्ञासावश खड़े हो गए, गाड़ी के गेट के खुलने का बेसब्री से इंतज़ार करने लगे।

गाड़ी में अंदर राकेश किसी से फोन पर बात कर रहा था, इसलिए गेट खुलने में देरी हुई। इतने में भीड़ ने चारों तरफ से गाड़ी को घेर लिया। पड़ोस के किसी भद्र पुरुष ने पहल की— “हटो-हटो, पीछे हो जाइए… तमाशा लगा है क्या! रास्ता दीजिए… उतरने दीजिए…”

गाड़ी का गेट खुला और धड़ाम की आवाज़ के साथ बंद हो गया। राकेश आँखों पर काला चश्मा लगाए निकला और तीर की तरह अपने घर के अंदर चला गया। माता-पिता और रिश्तेदार कुछ पूछ पाते उससे पहले ही राकेश ने कहा— “सब खत्म हो गया।” और खुद बेडरूम में घुस गया। धड़ाक की आवाज़ के साथ उसने दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया।

“बेटा, खोलो… क्या हुआ…? खोलो…”

राकेश दरवाज़े से पीठ लगाए, दूध पीते बच्चे की तरह रो रहा था। सीने से उसने देव्यांशी की तस्वीर लगा रखी थी। शायद वो अपने घर वालों को अपने आँसू नहीं दिखाना चाहता था। या फिर उन्हें जताना नहीं चाहता था कि उनके बेटे की ज़िंदगी इस दुनिया से चली गई। वो अब ज़िंदा लाश था।

बाहर माहौल में हलचल थी। महिलाओं के बीच उत्सुकता भरी खुसर-फुसर।

तभी बाहर से राकेश के पिता के फोन पर कॉल आया-

“हेलो…”

रुँधे गले से बस इतना ही कह पाए।

“सर, मिस्टर राकेश फोन नहीं उठा रहे। उनको बाहर भेजिए। एम्बुलेंस हम इतनी देर खड़ी नहीं रख सकते…”

“भेजता हूँ…” कह कर राकेश के पिता ने फोन रख दिया।

उन्होंने दरवाज़े को खटखटाया— “बेटा राकेश… एम्बुलेंस वाले का फोन आया है… बाहर बुला रहा है…”

अंदर राकेश दरवाज़े से टिक कर पागलों की तरह रो रहा था, तस्वीर सीने से लगाए। उसने तस्वीर को वापस पलंग के सिरहाने पर रखा, मुँह पोंछा, काला चश्मा फिर लगाया और तेज़ी से बाहर निकल गया।

राकेश और एम्बुलेंस ड्राइवर ने मिलकर गाड़ी से एक शरीर उतारा। कुछ लोग आगे बढ़े पकड़ने के लिए, लेकिन राकेश ने किसी को हाथ नहीं लगाने दिया। उन्होंने शरीर को घर के गेट के बाहर रख दिया  अंतिम दर्शन के लिए

पड़ोस के लोग और कुछ जिम्मेदार रिश्तेदार अंतिम संस्कार की तैयारी में लग गए।

देव्यांशी फिर दुल्हन की तरह सजी पर इस बार डोली नहीं थी, अर्थी थी। मंगलगीत नहीं “राम नाम सत्य है” की आवाज़ थी। रोना-बिलखना था, पर इस बार विदाई अंतिम थी।

बेटी जब मायके में दुल्हन सी सजती है तो विदाई पिया के घर के लिए होती है…
पर ससुराल में सजती है तो विदाई श्मशान घाट के लिए होती है।

राकेश ने अपने ही हाथों अपनी ज़िंदगी की चिता को मुखाग्नि दी। देखते ही देखते राकेश की ज़िंदगी राख के ढेर में बदल गई। सूरज तो रोज निकलता था, लेकिन राकेश की ज़िंदगी का सूरज डूब चुका था।

देव्यांशी के माता-पिता जिंदा लाश जैसे थे। बहनों की रो-रो कर आँखें पत्थर हो गई थीं। भाई सबसे छोटा था . वो भी बुत बन गया था।

अचानक सब कुछ एक रात में बदल गया था। मालूम होता था दोनों घरों पर जैसे कभी ना खत्म होने वाली खामोशी का कहर टूटा हो। कुछ लोग रो-रो कर सो गए। कुछ पथराई आँखों से लंबी काली पूस की इस स्याह रात के गुज़रने का इंतज़ार कर रहे थे।

राकेश, घर के बाहर जल रही आग के पास बैठा था। आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। लगता था आँखों में उमड़ा तूफान उँची-उँची आग की लपटों को बुझा देगा। अपलक राकेश वही जगह देख रहा था जहाँ से देव्यांशी छत से गिरी थी।

पीछे से आवाज़ आई-

“सर, ये लीजिए… थोड़ी चाय पी लीजिए… संभालिए अपने आप को…”

ये अरविंद था .राकेश के ऑफिस में काम करता था।

अरविंद ने राकेश के हाथ पकड़कर उनमें चाय पकड़ा देने की कोशिश की मगर राकेश तो पत्थर की मूर्ति सा हो गया था। कप हाथ से गिरकर टूट गया। इससे पहले भी कई लोग कोशिश कर चुके थे उसे चाय पिलाने की। राकेश अरविंद की बात नहीं टालता था… पर अरविंद भी उसे चाय नहीं पिला पाया।

“सर, उठिए… चलिए अंदर चलिए…”

अरविंद ने राकेश के अविरल बहते आँसू पोंछे और उठाने की कोशिश की। अरविंद की मदद के लिए दो-तीन पड़ोस के लोग और आ गए। सुबह साढ़े तीन बजने को थे . अकड़ चुके राकेश को उन लोगों ने किसी भी तरह उठाया और उस ज़िंदा लाश को घर के अंदर उसके कमरे में ले गए। कोई हाथ मल रहा था, कोई पैर… मगर राकेश पर कोई असर नहीं था।

राकेश को रजाई उढ़ाकर अरविंद ने सभी लोगों से कहा “चलिए, बाहर चलते हैं… सर को अकेले में शायद थोड़ा आराम मिले।”

अरविंद ने उंगली से सामने कमरे की तरफ इशारा करते हुए कहा—“राजेश जी, सुनिए… आप एक बार उस कमरे में भाभी के मां-पिताजी हैं… उनको देख लीजिए… और मैं कामिनी को बोलता हूँ, वो उनको चाय पिलाने की कोशिश करे… आप वहीं रहिएगा।”

राजेश को देव्यांशी के मायके वालों के पास भेजकर अरविंद ने आवाज़ लगाई—

“धीरे से… कामिनी… कामिनी…”

“जी?”

“भइया कैसे हैं?”

“कामिनी, मैंने सर को कमरे में लिटा दिया है। मैं यहीं हूँ उनके साथ। तुम भाभी के मायके वालों को देख लो, और उन्हें चाय पिलाने की कोशिश करो।”

“अरविंद, मैंने कई बार ट्राय किया… पर अंकल-आंटी—”

कामिनी की बात को बीच में ही काटते हुए अरविंद बोला- “कामिनी, बेटी खोई है। तुम प्लीज़… कैसे भी, कुछ गरम पिलाओ। और उनका ख्याल रखना। राजेश भी वहीं है।”

“ठीक है।” कहते हुए कामिनी रसोई में चाय बनाने चली गई।

अरविंद वापस राकेश के कमरे में गया और कुर्सी पर टेक लगाकर बैठ गया। थकान से उसकी आँख लग गई।

सुबह का सूरज बड़ी खामोशी से निकल आया था। घने कोहरे की चादर ने उसे धरती पर अपनी सुनहरी किरणें फैलाने से रोक रखा था।

सुबह के साढ़े छह का समय होगा तभी राकेश के पिता ने अरविंद को झकझोर कर कहा

“अरविंद बेटा… राकेश कहाँ है? बाहर नहीं है…”

“नहीं अंकल… वो यहीं कंबल में है देखिए…”

देखा तो रजाई खाली थी।

राकेश नहीं था।

अरविंद को सर्दी में पसीना छूट गया। “अंकल, रुकिए… मैं देखता हूँ…”

वो बाहर भागा। पिताजी वहीं कुर्सी पर सिर पकड़कर बैठ गए।

सारी जगह ढूँढने के बाद जब कहीं राकेश नहीं मिला तो अरविंद छत की तरफ भागा।

“हे भगवान… सर! आप यहाँ इतनी सर्दी और कोहरे में खड़े हैं!”

वो भी करीब खड़ा हो गया और उसने राकेश के पिता को फोन किया—

“अंकल, परेशान मत होइए… सर छत पर हैं।”

दोनों खामोश खड़े रहे… राकेश की हालत एक हारे हुए जुआरी की तरह थी। उसने गर्दन घुमाई तो देखा गमले में उस सुनहरे छाते के नीचे एक नन्ही सी खूबसूरत चिड़िया बाहर आने की कोशिश कर रही थी।

राकेश बरबस ही करीब चला गया। उसके माता-पिता तो उड़ गए… मगर तब तक वो नन्ही चिड़िया बाहर आ चुकी थी।

राकेश ने झुककर उसे देखा। उसे ऐसा महसूस हुआ मानो उसकी अधखुली आँखें उससे तमाम सवाल पूछ रही हों—

“क्यों? खुश हो? जाओ… जी भर कर पियो। अब कोई ‘कमीनी औरत’ तुम्हें नहीं सताएगी!”

चिड़िया बार-बार डाल से उड़कर आती और उसके सिर में चोंच मार कर भाग जाती। ऐसा लगता था मानो कह रही हो—

“बेरहम… बेवफ़ा… बेमुरव्वत इंसान दूर हट! मेरी नन्हीं औलाद के पास से…”

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