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सुनहरा छाता

किसी को कुछ बताना भी नहीं चाहती थी। किसे बताती? कौन सुनता? आँसू तो पहले ही सूख चुके थे। वो बस उस सुनहरे छाते को देखती आगे बढ़ रही थी। शायद उसी छाते के नीचे थोड़ी गुनगुनी धूप मिले… बिना रोक-टोक… बिना बाँधन।
पर तभी एक चीख गूँजी। लोग भागकर इकट्ठे हुए। सायरन बजाती एम्बुलेंस आई और एक शरीर उठा ले गई। इस घर में उसी घर में जिसके लिए उसने अपना मायका छोड़ा… खून के रिश्ते छोड़े बस सन्नाटा फैल गया। राकेश काला चश्मा लगाकर आया और बस इतना कहा “सब ख़त्म हो गया।”

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