
शारदा कनोरिया शुभा, प्रसिद्ध लेखिका, पुणे
“विश्वास और अंधविश्वास की सरहद कितनी पतली होती है।”कहते हैं, हर गाँव में एक और औरत होती है, जिसका नाम लेते ही बच्चों के चेहरे पीले पड़ जाते हैं और जवानों के सीने में भी धड़कन तेज़ हो जाती है।
बिजोरी गाँव में वह नाम था — चंपा दाई।उसका झुका हुआ, कंकाल-सा शरीर… बिखरे सफ़ेद बालों से आधा चेहरा ढँक जाता… और फटे होंठों से लगातार रिसती बुदबुदाहट — जैसे कोई अदृश्य प्रेत उसके भीतर से बोल रहा हो।
रात के सन्नाटे में उसकी कच्ची झोंपड़ी से जब लालटेन की मद्धम रोशनी काँपती हुई बाहर फैलती और साथ ही धुएँ की कड़वी गंध आती, तो लगता मानो वहाँ कोई परछाईं मंडरा रही हो।
बच्चे कहते — “उसकी आँखें अँधेरे में लाल चमकती हैं।”
बुज़ुर्ग दबे स्वर में जोड़ देते — “वो रात को श्मशान जाती है… और माटी से प्रेत बुलाती है।”
एक बार सरपंच की बेटी गुड़िया पर अजीब-सी बीमारी टूट पड़ी।
शरीर आग की तरह तपने लगा, साँसें टूट-टूट कर चलतीं, होंठ काले-नीले हो गए।
गाँव का वैद्य, हकीम, और शहर से बुलाए डॉक्टर तक हार मान गए।
और फिर वही फुसफुसाहट उठी —
“ये… चंपा दाई का काम है।” वही ठीक कर सकती है।
आख़िर डरते-डरते उसे बुलाया गया।
गाँव की गलियों से उसकी लाठी की ठक-ठक की आवाज़ सुनते ही घरों के दरवाज़े अपने-आप बंद हो गए।
लोग परदे के पीछे से झाँकते और मन ही मन मंत्र बुदबुदाते।
जब वह घर में दाख़िल हुई, तो तेल का दीया अचानक फड़फड़ाकर बुझ गया…
और ठीक उसी वक़्त बाहर पीपल पर बैठा उल्लू हू-हू करके चीख़ उठा।
चंपा दाई ने गुड़िया की नब्ज़ टटोली।
अपनी फटी-पुरानी पोटली खोली और उसमें से जड़ी-बूटियाँ, सूखे बीज, कुछ पत्ते और चूरा निकालकर पीसने लगी।
उसके होंठों से फूटती बुदबुदाहट अब किसी अनजाने, गूढ़ मंत्र जैसी लग रही थी।
धुएँ के बीच लोग कसम खाते कि उन्होंने छाया जैसी आकृतियाँ देखीं — मानो कोई अदृश्य प्राणी कमरे में घूम रहा हो।
असलियत यह थी कि वह वैद्य थी।
उसके पास नीम, हल्दी, तुलसी और अज्ञात जड़ी-बूटियों की एक प्राचीन, चर्मपत्र की किताब थी।
पर गाँववालों की आँखों में वही किताब टोने-टोटके का ग्रंथ बन चुकी थी।
तीन रातें वह बच्ची के पास बैठी रही।
रात को उसकी झोंपड़ी से लोहे जलने की गंध आती, कभी भीतर से ऐसी खड़खड़ाहट जैसे सूखी हड्डियाँ आपस में टकरा रही हों।
लोग खिड़कियों की साँकल कसकर चढ़ा देते और कानों में रूई ठूँस लेते।
चौथे दिन सुबह, जब सबने मान लिया था कि अब गुड़िया का जीवन खत्म है…
तभी उसने धीमे-धीमे आँखें खोलीं।
गाँव का सन्नाटा ऐसा था मानो समय थम गया हो।
सरपंच काँपती आवाज़ में बोला —
“ये… ये जादू था या इलाज?”
चंपा दाई का झुर्रियों से भरा चेहरा पहली बार मुस्कुराया।
उसकी आवाज़ गहरी थी, जैसे धरती की कोख से फूट रही हो —
“ज्ञान जब अज्ञान में डूब जाए तो टोना कहलाता है…
पर समझो तो वही औषध है, वही विद्या।”
उस दिन से चंपा दाई डायन नहीं रही।
पर रात ढलते ही, जब हवा में उसकी बुदबुदाहट गूँजती और लालटेन की लौ सिहरती…
तो बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबकी रूह अब भी काँप उठती थी —
मानो औषध और टोने की वह बारीक सरहद आज भी धुंधली पड़ी हो।
बहुत सुन्दर कहानी…
बहूत अच्छी कहानी
Nice story