
डॉ संदीप चौहान “मोहन” उझानी, जिला बदायूं (उत्तर प्रदेश)।
नारी एक शब्द नहीं केवल, बल्कि शब्दकोश है।
नारी एक शब्द नहीं केवल, बल्कि जीवन का उद्घोष है।
नारी एक शब्द नहीं केवल, बल्कि कई रूपों में विघटित है।
गणना से परे मित्र, इसके रूप तो अगणित हैं।
नारी आज अबला नहीं मित्र, सबला बन लहराए परचम।
पुरुष प्रधान जगत में नारी, अब पुरुष से है कम नहीं।
नारी है शक्ति पृथ्वी की, बिन नारी जग शक्ति विहीन।
नारी बिन संपूर्ण सृष्टि में, सब कुछ ही स्तरहीन।
नारी केवल नहीं कामिनी, शस्त्र-शास्त्र की पर्याय।
नारी केवल नहीं जन्मदाता, कभी-कभी मृत्यु बन जाए।
नारी है गंभीर सिंधु सी, नारी है अंबर की छाया।
नारी पर्वत सी अविचल है, नारी है फूलों की काया।
नारी है धरती का धीरज, नारी ही हिम्मत है नर की।
पुरुष एक घर की शोभा है, नारी शोभा तीनों घर की।
हर प्रकार से नारी नर से, ऊँची पद और प्रतिष्ठा वाली।
नारी ही सीता, सावित्री, सुलोचना सी निष्ठा वाली।
नारी है श्रृंगार सृष्टि का, नारी ही सृष्टि की प्रलय।
नारी से ही उद्गम सबका, नारी में ही सभी का विलय।
नारी क्षमा, कृपा, गुरु, माता, रिद्धि-सिद्धि और जीवन।
नारी का सम्मान जहाँ है, उसी जगह जन्नत है मोहन