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तुम्हारे बाद भी, तुम्हारी निशानियाँ

प्रीति प्रधान, लेखिका, भिलाई, जिला दुर्ग (छत्तीसगढ़)

जिन चीजों को प्रिय ने छुआ,

उन चीजों से प्रेम हो जाना भी प्रेम ही है।

अलगनी पर लटके तुम्हारे कपड़े,

दफ्तर की जल्दी में 

अधूरा छोड़ा नाश्ता।

वो चाय की प्याली,

यहां तक कि तुम्हारी जुराबें जिनकी जोड़ी

ढूंढते हुए तुम कुछ बाहर 

ही बिखेर गये,

और वो गीला तौलिया

जिन्हें पलंग पर ही छोड़ गये।

तुम्हारे घर से जाने के बाद

तुम्हारी याद दिलाते हैं

और मै बैठ जाती हूं

थकी सी चुपचाप।

सोचने लगती हूं

हल्की सी मुस्कान

के साथ।

क्या यही है तुम्हारा 

तुम्हारे बाद।

 कुछ तो है

जो है जो सिर्फ तुम्हारे और मेरे बीच है।

महसूसती हूं उस अधिकार को

जिसमें तुम्हारे अंदर मैं हूं

हां तुम्हारे अंदर मैं ही हूं

वह भी तुमसे कुछ ज्यादा।

तुम बिखेरते जाते हो,

मैं सब कुछ जतन से

रखती जाती हूं।

तुम्हारे कपड़े, तुम्हारी चीजें।

मैं सहजेती हूं

रिश्तों को सारे साजो सामान के साथ।

3 thoughts on “तुम्हारे बाद भी, तुम्हारी निशानियाँ

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