राधाकृष्णन की रोशनी में आज का अँधेरा पढ़ना

आज हम शिक्षक दिवस मनाते हैं—पर यह महज़ कैलेंडर की औपचारिक तारीख़ नहीं, एक विचार की परीक्षा है। इस दिन का अर्थ तभी पूरा होता है जब हम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को किताबों के अध्याय से बाहर निकालकर अपने समय की नब्ज़ पर रख दें। वे केवल दार्शनिक, कुलपति या भारत के दूसरे राष्ट्रपति नहीं थे; वे उस परंपरा के प्रतिनिधि थे जो मानती है—“सच्चा शिक्षक वही है जो छात्रों को अपने लिए सोचने के लिए प्रेरित करे।” यह वाक्य आज के युग में एक चुनौती-पत्र है: सूचना के महासागर में स्वतंत्र चिंतन कैसे बचाए रखें?

राधाकृष्णन की पहली सीख—शिक्षा डिग्री नहीं; चरित्र-निर्माण है। हमारे स्कूलों—ख़ासतौर पर सरकारी स्कूलों—ने पिछली पीढ़ियों को वह मेरुदंड दिया जिस पर समाज खड़ा होता है। आज जब ‘एजुकेशन’ को ‘एड-टेक’ और ‘एड-इंडस्ट्री’ के फ़्रेम में कस दिया गया है, तब यह स्मरण ज़रूरी है कि शिक्षक वेतनभोगी नहीं, मूल्य-निर्माता हैं। एक पुल ग़लत बने तो एक दुर्घटना होती है; एक डॉक्टर ग़लत बने तो सौ जिंदगियों का जोखिम है; पर एक शिक्षक ग़लत बने तो पीढ़ियाँ भटकती हैं। इसलिए शिक्षक दिवस ‘टीचर-एप्रिसिएशन पोस्ट’ से आगे बढ़कर ‘टीचर-रेस्पॉन्सिबिलिटी प्लेज’ होना चाहिए—कि पाठ्यक्रम के साथ-साथ निजी, नैतिक और राष्ट्रीय शिक्षा की आग भी जलती रहे।

दूसरी सीख—ज्ञान शक्ति है, पर उद्देश्यहीन ज्ञान शोर है। राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन—वेद, उपनिषद, गीता—को आधुनिक विमर्श से जोड़ा। बात सिर्फ़ ‘कितना पढ़ा’ की नहीं, ‘क्यों पढ़ा’ की है। आज के विद्यार्थी के लिए इसका अनुवाद यह है: स्क्रीन-टाइम का संयम, ध्यान का अनुशासन और जिज्ञासा का सतत अभ्यास। यदि स्मृति और मनन का समय मोबाइल खा ले, तो ज्ञान ‘डाटा’ होकर रह जाता है—और डाटा चरित्र नहीं गढ़ता। एक सादा-सा प्रण—“चयन तक दिन के दो घंटे से अधिक स्क्रीन नहीं”—किसी भी कोचिंग के पोस्टर से ज़्यादा प्रभावी नैतिक प्रशिक्षण है।

तीसरी सीख—विनम्रता ही महानता की स्याही है। राधाकृष्णन ने अपने जन्मदिन को शिक्षक दिवस बना देने की सरल-सी इच्छा से यह बताया कि गौरव पद से नहीं, उद्देश्य से आता है। आज जब ‘ब्रांडिंग’ अक्सर ‘बिल्डिंग’ से बड़ी लगती है, तब विनम्रता हमें जड़ों से जोड़ती है। वही विनम्रता आगे चलकर सेवा में बदलती है—और सेवा ही शिक्षक का असली पुरस्कार है।

चौथी सीख—गुरु-शिष्य संबंध कक्षा से बड़ा, जीवन से लंबा है। गुरु सीढ़ी हैं—छत नहीं; पर दुनिया की कोई छत सीढ़ी के बिना नहीं मिलती। एक अकादमी, एक पाठ्यक्रम, एक टेस्ट-सीरीज़—ये सब साधन हैं; साध्य है मनुष्य का बनना। राधाकृष्णन होते तो शायद आज कहते: “रैंक और रेज़्यूमे के बीच जो खाली जगह है, उसे ‘संस्कार’ से भरिए।” यही वह जगह है जहाँ से भ्रष्टाचार-निरोध की शुरुआत होती है—किसी नियम-पुस्तिका से नहीं, अपने भीतर ली गई छोटी-सी प्रतिज्ञा से: “न वेतन के लिए पढ़ाऊँगा/पढ़ूँगा, न नौकरी के लिए पढ़ूँगा; जीवन के लिए पढ़ूँगा—और दूँगा।”

पाँचवीं सीख—ज्ञान, कर्म में उतरे तो परिवर्तन बनता है। राधाकृष्णन विचारक थे, पर कर्मयोगी भी। वे भारतीय बुद्धि-विरासत को वैश्विक मंच तक ले गए और संस्थागत सुधारों की पैरवी की। आज के संदर्भ में यह संदेश है: व्यवस्थाएँ जहाँ-जहाँ चूकें, समाज वहाँ-वहाँ हाथ बढ़ाए—पर यह ‘फेल्ड स्टेट’ का शोकगीत नहीं, ‘सिविक एथोस’ का राष्ट्रगीत हो। महामारी के दिनों की सामूहिकता, अनाम नागरिकों की तत्परता, सीमित साधनों के बीच साझा सहारा—यही आधुनिक ‘गुरु-परंपरा’ की सामाजिक प्रतिलिपि है: मैं अकेला नहीं, हम साथ हैं।

अब कुछ भूली-बिसरी—पर ज़रूरी बातें, जो आज के शिक्षक दिवस को धार देती हैं:

  1. पाठ्यक्रम बनाम संस्कारक्रम: सिलेबस वेबसाइट पर है; पर “कैसे पढ़ना है कि जीवन भी पास हो”—यह अनुभव गुरु देता है। गुरु की व्यक्तिगत असफलताएँ भी हमारी सामूहिक सफलता की दिशा बनती हैं—क्योंकि वे दिखाती हैं ‘क्या नहीं करना’।
  2. इतिहास का आदर, भविष्य का साहस: जो पीढ़ी अपने पुरखों का अवमूल्यन करती है, उसे भविष्य रास्ता नहीं देता। असहमतियाँ रहें—ज़रूर; पर अवमानना नहीं। राधाकृष्णन का सांस्कृतिक सेतु आज भी पूछता है—“किरदार बचा रहा? तो बहस का ताप तर्क की रोशनी बनेगा, धुआँ नहीं।”
  3. मानसिक स्वास्थ्य की सच्चाई: ‘डिप्रेशन’ का मज़ाक नहीं; पर ‘अभिभव का अभ्यास’ ज़रूर। धूप में निकलना, बारिश में भीगना, असफलताओं को ‘लैब’ की तरह लेना—यह भी शिक्षा है। जीवन-शक्ति इतिहास से मिलती है; अनुशासन वर्तमान से।
  4. मेरिट की सामाजिक वापसी: जिसने फीस देकर पढ़ा, वह भविष्य में किसी एक ऐसे बच्चे को पढ़ाए जो फीस न दे सके—यह छोटा-सा ‘रिवर्स स्कॉलरशिप’ समाज को शिक्षक-राष्ट्र में बदल देता है।
  5. ईमानदारी की प्रतिज्ञा: “चयन हुआ या नहीं, ट्रांसफ़र रुका या नहीं—रिश्वत नहीं लूँगा/दूँगा।” यह एक वाक्य कई कानूनों से अधिक प्रभावशाली नागरिक-शिक्षा है।

अंत में, राधाकृष्णन हमें याद दिलाते हैं कि शिक्षा ‘टॉपर’ बनाने का कारख़ाना नहीं, ‘दीप से दीप’ जलाने की परंपरा है। शिक्षक ट्यूबलाइट से कनेक्शन नहीं जोड़ते; वे भीतर का तेल, बत्ती, लौ—तीनों गढ़ते हैं। इसलिए आज का उत्सव तब सार्थक होगा जब हम तीन छोटे संकल्प लें—
(1) चिंतन का समय बचाऊँगा, स्क्रीन का नहीं।
(2) श्रेष्ठता का माप वेतन/वायरल पोस्ट से नहीं, सेवा-संस्कार से करूँगा।
(3) जो सीढ़ी मुझे ऊपर ले गई, मैं भी किसी और के लिए बनूँगा।

शिक्षक दिवस की रोशनी में यही संदेश सबसे उजला है: ज्ञान तब तक अधूरा है जब तक वह चरित्र नहीं गढ़ता; और चरित्र तब तक अधूरा है जब तक वह समाज को सहारा नहीं देता। राधाकृष्णन की यही ‘जीवित-कक्षा’ है—जहाँ हर विद्यार्थी, शिक्षक होकर निकलता है।

डॉ. मुकेश गर्ग असीमित, प्रसिद्ध व्यंगकार, गंगापुर सिटी, राजस्थान

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