शिव शक्ति

शिव ही सत्य हैं और सत्य ही शिव हैं। उनकी पहचान सत्यम् शिवम् सुन्दरम् के रूप में होती है। शिव ही शक्ति हैं और शक्ति ही शिव—दोनों एक ही माला के अनमोल मोती हैं जिनसे संपूर्ण विश्व आलोकित होता है। ब्रह्मा जी ने शिव की प्रेरणा से ही ब्रह्मांड की रचना की और विष्णु जी को सृष्टि के पालन का दायित्व भी शिव ने ही प्रदान किया। सृष्टि का संहार स्वयं शिव के हाथ में है। यही इस सृष्टि का सत्य है। परंतु सदाशिव का प्राकट्य कैसे हुआ—इसका प्रमाण शास्त्रों में नहीं मिलता, क्योंकि वे अनादि और अनंत हैं। त्रिकालदर्शी सदाशिव सबसे बड़े प्रशासक और प्रबंधक हैं, जो सबको उनके उत्तरदायित्व सौंपते हैं और सबके कार्य पर सतर्क दृष्टि रखते हैं। समय-समय पर समीक्षक बनकर और कभी तिर्यक दृष्टि से देखकर वे सभी की सहायता को तत्पर रहते हैं। वास्तव में शिव शब्दातीत और अवर्णनीय हैं—उनकी महिमा अपरंपार है। यही स्मरणीय है कि शंकर ही सदा सेवनीय हैं और वही सभी दुःखों का हरण करने वाले हैं।

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राधाकृष्णन की रोशनी में आज का अँधेरा पढ़ना

आज हम शिक्षक दिवस मनाते हैं—पर यह महज़ कैलेंडर की औपचारिक तारीख़ नहीं, एक विचार की परीक्षा है। इस दिन का अर्थ तभी पूरा होता है जब हम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को किताबों के अध्याय से बाहर निकालकर अपने समय की नब्ज़ पर रख दें। वे केवल दार्शनिक, कुलपति या भारत के दूसरे राष्ट्रपति नहीं…

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कक्षा में छात्रों को पढ़ाते हुए शिक्षक, ज्ञान और प्रेरणा का वातावरण

गुरु का स्पर्श, सफलता का मार्ग

शिक्षक वास्तव में जीवन के सृजनहार हैं। जैसे कुम्हार कच्ची मिट्टी को चाक पर घुमाकर आकार देता है, वैसे ही शिक्षक बच्चों के कोमल मन को गढ़कर उन्हें दिशा और स्वरूप प्रदान करते हैं। माता-पिता हमें जन्म देते हैं, परंतु चरित्र की नींव और मूल्यों का उपहार शिक्षक ही देते हैं।
शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाते, वे विचारों को नई धार देते हैं और भविष्य को संवारते हैं। वे बच्चों के भीतर आत्मविश्वास जगाते हैं, चुनौतियों का सामना करने की क्षमता पैदा करते हैं और सफलता की ओर बढ़ने का मार्ग दिखाते हैं। जब विद्यार्थी प्रगति पथ पर आगे बढ़ते हैं और नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करते हैं, तो उनकी उपलब्धियों में शिक्षक की मेहनत और प्रेरणा की झलक साफ़ दिखाई देती है।

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गुरु की छाया में गढ़ता जीवन

शिक्षक जीवन के आधार स्तंभ होते हैं। जैसे कुम्हार कच्ची मिट्टी को चाक पर घुमाकर नया आकार देता है, वैसे ही शिक्षक बच्चों के कोमल और अबोध मन को गढ़ते हैं। बचपन में माता-पिता से बोलना, चलना और सहारा लेना सीखा जाता है, लेकिन जब शिक्षा के मंदिर में पहला कदम रखा जाता है, तब बच्चा पहली बार माता-पिता का हाथ छोड़कर एक नए वातावरण में प्रवेश करता है।

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