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हश्र..

मंजूला श्रीवास्तव, नई दिल्ली

ओढ़ाई थी चुनरी पतोहू के सिर पर पोते के स्वागत में,
बधाई लेकर आई बुआ, ठन गई थी देहरी पर नेग के नाम।
उतरवा लिए थे कंगन भाभी से, तीसरी पीढ़ी के चिराग के नाम।
जिमाए थे पत्तल सातों पूरा दादा ने बड़े शान से।
ताली पीटते किन्नरों को उछाले थे चाँदी के सिक्के डैडी ने नाच-नाच।

लो जी, क्या हो गया आज तुम्हारे देवतुल्य बेटे को?
खड़ा है नंग-धड़ंग आज सरे-बाज़ार इज़्ज़त के नाम पर।
करो न भीड़ इकट्ठी, आज भी पीट-पीट कर थाली काँसे की।
टंसुए बहाती जो माँ, मन्नतों के धागे बाँधती चार-चार बेटियों के नाम,
भर मुहल्ले बाँटी थी मिठाई दादी ने बधाई गीत के नाम।

सब कसूरवार हैं, एक-एक करके देवतुल्य कुलदीपक के पालनहार।
सुनी क्या कभी बेटियों की, इकलौते बेटे के सामने माँ ने?
दी क्या इज़्ज़त बराबर से बेटियों को बेटे के सामने पिता ने?

देवपुत्र की तरह ही पूजा गया अपनी बहनों के समक्ष समाज में।
पनपने से पूर्व ही मार दिया उसके संस्कारों को,
मिल-बाँट थोड़ा-थोड़ा तथाकथित सभ्य समाज की भेड़चाल ने अपनी खुशियों के नाम पर।

न सिखा सके, न पढ़ा सके, रह गए लुटाते मोतियाँ,
लूटना ही सीख सका केवल अपने समाज में इज़्ज़त के नाम पर।

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