रिश्तों पे चढ़ी हुई
खामोशी की परत
मन को किसी गहरे निर्जल
कुंए में ,
धकेल देती है ।
छा जाती है आकुलता
और विकलता
जहाँ नहीं होती कोई चाहत
व उम्मीद ,
नव पल्लव विकसित होने की ।
मन के किसी सुदूर कोने में
धरी रह जाती है ,
आशा और अभिलाषा
सुंदर सी यादों की ,
पोटली बनकर ।
हर अहसास पिघल कर
बन जाते हैं ,
पतझड़ का मौसम
और फिर बांझ बन फट पड़ती है
ये धरा सा मन ।

अर्चना मिश्रा, अश्क, प्रसिद्ध लेखिक, बोकारो (झारखंड)
हार्दिक बधाई ❤️
वाह, पतझड का मौसम बांझ बन फट पडती है,,, मन के किसी कोने को झकझोरने वाली रचना
बहुत सुंदर रचना है