वो जो गुलज़ार थी …

मेरे नैहर की छत पर बनी वह छोटी-सी कोठरी कभी मेरे कच्चे सपनों से गुलज़ार रहती थी। उसकी छत की कड़ियों पर न जाने कितनी कोमल कहानियाँ लिखी थीं। दीवारों ने मेरे दिल की मीठी बातें सुनीं और खूँटियों पर मेरी अधूरी ख़्वाहिशें टँगी रहीं। चूने से पुती दीवार की दरारों में मेरी बचकानी कविताएँ छिपी थीं, जिन्हें आज खोजने पर भी नहीं मिलता।
आँगन में मेरी खिलखिलाहटों की गूँज थी, ज़ीने पर दौड़ते कदमों की थाप थी और दरवाज़ों पर हथेलियों की छाप। उस सँकरी दीवार पर, जो दो छतों को जोड़ती थी, मैं और दीदी दौड़कर एक साँस में पार किया करते थे। दादी की डाँट और राहगीरों की नज़रें उस खेल की गवाह रहीं।
वह कोठरी सिर्फ़ छिपने की जगह नहीं थी, बल्कि कच्ची उम्र की नासमझियों का अड्डा भी। वहीं छिपकर कच्ची अमियाँ खाईं, वहीं बरगद के पत्तों पर कुल्फ़ी रखकर चखी और वहीं किताबें माँ-दादी से छिपाकर पढ़ीं। सहेलियों और दीदी के साथ बैठकर हमने न जाने कितनी बहसें कीं, ज़माने को बदलने के सपने देखे।आज उस कोठरी में टूटी छत और लटकी शहतीरें हैं। और उन्हीं शहतीरों पर मेरे अधूरे, कच्चे सपने अब भी झूल रहे हैं।

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मन 

यह कविता रिश्तों में पसरी हुई खामोशी और मन की गहराइयों में उपजी पीड़ा का चित्रण करती है। कवि कहता है कि यह खामोशी, मन को एक निर्जल और सूने कुएँ में धकेल देती है, जहाँ आकुलता और विकलता का साया छा जाता है। वहाँ न कोई चाहत होती है, न उम्मीद—नव अंकुर फूटने की संभावना भी नहीं।मन के किसी कोने में आशाएँ और अभिलाषाएँ सुंदर यादों की पोटली बनकर धरी रह जाती हैं। हर अहसास धीरे-धीरे पिघलकर पतझड़ के मौसम में बदल जाता है, और अंततः यह मन एक बांझ धरा की तरह फट पड़ता है।

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