gulmohar

मन 

यह कविता रिश्तों में पसरी हुई खामोशी और मन की गहराइयों में उपजी पीड़ा का चित्रण करती है। कवि कहता है कि यह खामोशी, मन को एक निर्जल और सूने कुएँ में धकेल देती है, जहाँ आकुलता और विकलता का साया छा जाता है। वहाँ न कोई चाहत होती है, न उम्मीद—नव अंकुर फूटने की संभावना भी नहीं।मन के किसी कोने में आशाएँ और अभिलाषाएँ सुंदर यादों की पोटली बनकर धरी रह जाती हैं। हर अहसास धीरे-धीरे पिघलकर पतझड़ के मौसम में बदल जाता है, और अंततः यह मन एक बांझ धरा की तरह फट पड़ता है।

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