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आज़ादी स्त्री की…

मैंने सोचा ही था कि
आज़ाद हूँ मैं।

और फिर कितनी ही बातें
जहन में गूंजने लगीं…।

जब कॉलेज जाने को
नीला, मेरी पसंद का वन-पीस पहना,
भाई ने टोका—”ये कपड़े बदल,
स्कर्ट पहनकर जा…!”
मैं हताश थी।

जब ससुराल में आई,
सास ने कहा—
“चार लोग घर में आते-जाते हैं,
तुम्हारे ससुर जी भी हैं,
पल्ला रखो सर पर।”
और अपनी सुंदर शिफॉन की साड़ी को
सर पर पल्ला ले,
चार–पाँच क्लिप्स से फिट किया
मलूल मन से।

और जब मेरी मृत्यु हुई,
सफ़ेद चादर से
मेरा मुँह छोड़,
सारे शरीर को ढक दिया गया।
मेरी आत्मा कुलबुलाती रही
मुक्ति के लिए…।

और फिर जैसे ही लकड़ी के ढेर पर
मेरे मृत शरीर को पति ने अग्नि दी,
धधकने लगा शरीर और
देखते-देखते राख में तब्दील हुआ…!

अहा हा..!
शरीर राख बन चुका था,
और आत्मा आज़ादी का जश्न मनाने लगी।
सही मायनों में अब आज़ाद हुई हूँ मैं…!

मुक्त हो सब बंधनों से
आज़ाद हुई हूँ मैं…
अब आज़ाद हूँ मैं…!

कल्पना पाटिल, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर

2 thoughts on “आज़ादी स्त्री की…

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