बड़ी जिद्दी है तू ऐ नदी
ज़िद तुझको क्यों है नदी
अपने खारा होने की,
निज अस्तित्व को खोकर
दरिया के सारा होने की|
लील चुका वह कई नदियां
फिर भी बुझी ना उसकी प्यास,
तू तो पूरी खारी हो गई
पर उसने कहाँ ली तेरी मिठास|
ना जाने उसकी लहरों को
किसकी रहती है सदा तलाश,
नदिया सारी खुद को खो चुकी
किन्तु बुझी ना उसकी प्यास|
नदिया सारी मिल गई
तब तो वह बना है सागर,
किस सीप की आशा में
छलकता रहता उसका गागर|
अच्छा भूल गयी मैं तो ये
तू सिर्फ नदी ही नहीं,
तू तो है हम सबकी माँ,
तुझसे बेहतर भला किसने जाना
खुद को खोकर सब कुछ पाना|

सवितासिंह मीरा, प्रसिद्ध कवयित्री, जमशेदपुर