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जिद्दी नदी…

नदी बड़ी जिद्दी है। उसे अपने खारेपन पर अड़ जाने की जिद है, अपने अस्तित्व को खोकर भी दरिया में समा जाने की चाह है। दरिया ने कितनी ही नदियों को अपने में समा लिया, फिर भी उसकी प्यास कभी बुझी नहीं। नदी अपनी मिठास खोकर खारी हो गई, लेकिन दरिया ने कभी उसकी मिठास नहीं अपनाई। उसकी लहरें न जाने किसकी तलाश में सदा बहती रहती हैं। सब नदियाँ अपने आप को खो चुकीं, फिर भी उसकी प्यास असीम बनी रही। नदियाँ सब मिलकर ही सागर बनाती हैं। पर यह सागर अब भी किसी सीप की आशा में छलकता रहता है। और तब याद आता है कि नदी केवल जलधारा नहीं, वह माँ भी है—हम सबकी माँ। जिसने हमें यह सिखाया कि खुद को खोकर ही सब कुछ पाया जा सकता है।

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