नागालैंड की सुबह धुंध में लिपटी थी। ऊँचे- ऊँचे पहाड़ों ने रात की कहानियों को अपने सीने में छिपाए रखा है। छोटे से खोम्ती गांव की पगडंडियों पर सूरज की किरणें अभी पूरी तरह नहीं उतरी थीं। बेशक हवा में नम मिट्टी की सुगंध थी, और दूर कहीं जंगल से आती चिड़ियों की आवाजें एक अधूरी धुन सी बुन रही थीं। तेईस साल की लिमा अपने घर के आंगन में खामोशी ओढ़े बैठी थी जबकि उसकी उंगलियां बांस की टोकरी पर थिरक रही थीं। ज़ेहन कहीं और ही भटक रहा था।
नेत्रों के आगे दूर तक फैले पहाड़ी परिदृश्य उसे हर सुबह नया लगते थे। भीतर से उदास लिमा के नेत्र बार- बार बूँदों में डूब रहे थे। उसकी उदासी का राज़ पहाड़ों के पीठ पर लगे वृक्षों के वक्ष में जज़्ब थे।
लिमा की दादी को प्यार से गाँव वाले ‘आमा’ कहकर पुकारते थे। दादी! लिमा के पास रखे चूल्हे पर चाय उबाल रही थीं। देर से चुप लिमा की चुप्पी, चुभी तो दादी की आँखें भी पनियल हो गईं। दादी ने मुख फेरकर कहा-
“लिमा! चाय पी ले, ठंड बढ़ रही है।”
स्नेह में डूबी आमा की आवाज़ किसी खोह से आती सी लगी। आमा की आवाज में वही पुराना प्रेम था, जिसने लिमा को बचपन से ज़िंदा रखा। हर वक़्त अहसास कराया कि कोई है जो सिर्फ़ उसका है। दादी का हाथ थामे बड़ी होती लिमा के अधर पल में मंद- मंद मुस्कान से भर गए। लिमा ने चुपचाप टोकरी एक ओर रख दिया और चाय का प्याला थामकर एक घूँट पीया।
चाय की चुस्की लेते हुए- “आमा, आपको कभी ऐसा लगा कि ये पहाड़ हमें कुछ कहना चाहते हैं, पर हम सुन नहीं पाते?”
आग से उठती लपटों की ओर देखती आमा हल्के से मुस्कुराईं। “पगली! पहाड़ हमेशा बोलते हैं। उनकी धड़कन मनुष्यों से तेज चलती है। बस पहाड़ों की हफहरी केवल कुल्हाड़ी समझते हैं। पहाड़ी पीड़ा की बोली समझने के लिए दिल का शोर थामना पड़ता है। थमे दिल की नसे जल्दी चटकती हैं। चटकवाही वाले कहाँ किसी की सुनते हैं, बस अपनी ही धुन में रहते हैं।”
दादी को सुनती लिमा की आंखें धुंध भरे क्षितिज पर टिकी रहीं। पिछले साल, जब उसका बड़ा भाई अतोई सेना में भर्ती होकर देश सेवा की ट्रेनिंग पर चला गया तब से घर में एक खालीपन सा बस गया था। अतोई की हंसी, उसकी बांसुरी की धुन पर छेड़े तान और बात- बेबात हंसी- ठिठोली से भरे दिन अब यादों में सिमट गया था। कुछ महीने पहले खबर आई कि अतोई की टुकड़ी पर हमला हुआ। जख्मी अतोई जिंदा है या नहीं ये एक रहस्य। लिमा का दिल- दिमाग़ बार-बार उसी अनहोनी की ओर भागता, जिसे वह सोचना भी नहीं चाहती थी। “काश, उस दिन मेरा भी चयन हो गया होता तो हम दोनों एक- दूसरे के साथ- साथ चलते फिर हमें कोई छू भी न पाता।”
“आमा ! अगर अतोई…” लिमा की आवाज रूँध कर गले में अटक गई। आमा ने गहरी साँस लेकर उसकी ओर देखा। अनुभवी आँखें उम्र के दर्द का सायबान थीं इसलिए दर्द पढ़ खुद भी तड़प उठीं।
ढाँढस बँधाती – “लिमा ! तू देखना एक दिन अतोई ज़रूर आएगा। पहाड़ अपने बच्चों को कभी मजबूर, लाचार और बेबस अवस्था में नहीं छोड़ते।” “पर दादी…” शब्द हवा में झूल गए।
उस रात, गांव में एक छोटा- सा उत्सव था। हर साल, सर्दियां शुरू होने से पहले, गांव वाले जंगल की आत्माओं को धन्यवाद देने के लिए इकट्ठा होते थे। लिमा ने अपने कंधे पर पारंपरिक शॉल डाला और आमा के साथ गांव के चौक की ओर चल दी। रास्ते में, जंगली फूलों की खुशबू ने उसे एक पल के लिए रोका। ठिठके कदम से उसने एक पीला फूल तोड़ा और उसे अपने बालों में खोंस लिया। “अतोई को ये फूल बहुत पसंद थे।” लिमा ने जैसे ही ये सोचा उसके दिल में तेज़ दर्द उठा और वह लगभग निढाल सी हो गई।
उस दिन चौक में आग जलाई गई थी। बुजुर्ग गीत गा रहे थे और बच्चे उनके चारों ओर नाच रहे थे। लिमा ने देखा कि गांव के सबसे बुजुर्ग अंकल नुंगशी अपनी बांसुरी निकाल रहे थे। बाँसुरी निकालते वक्त उनकी उंगलियां कांप रही थीं, लेकिन जैसे ही उन्होंने बांसुरी को अधरों पर रख बजानी शुरू की, हवा में एक नशीली धुन फैल गई। इधर- उधर जाते मुसाफ़िरों के कदम थम गए। थमे कदमों की लय बाँसुरी में विन्यस्त हो गई। लिमा को एक पल को लगा जैसे कि ये धुन अतोई ने छेड़ी है। “छेड़ मिलन के गीत रे मितवा…” उसके कानों में वही राग, लय गूँजें जिसे अतोई अपने कमरे में रात के सन्नाटे में अक्सर बजाया करता था। उसकी आंखें नम हो गईं। वह चुपके से भीड़ से अलग होकर पास के एक पेड़ के नीचे बैठ गई। धुंध अब और गहरी हो चली थी, लेकिन आग की रोशनी उस तक पहुंच रही थी। मद्धम रोशनी में लिमा का चेहरा साफ़ दमक रहा था।
“लिमा?” पीछे से आई एक धीमे आँच के स्वर ने उसे चौंका दिया। वह पलटी तो देखा- एक परछाई धुंध में से निकल रही थी। उसका दिल जोर से धड़का और मुख बेसाख़्त- “अतोई?” डर और विश्वास में डूबी लिमा की आवाज़ ग़म कि गोया ख़ुशी में लड़खड़ाई। फिर धीरे- धीरे- धीरे परछाई करीब आने लगी। औचक परछाईं तनिक दूरी पर रुक गई। दो हाथ हवा में लहराये पर पैर किसी के काँधे के सहारे लगभग झूल रहे थे। अतोई का जवान खिला मुख पीला पड़ चुका था। धंसी आँख देख लिमा का दिल धक से रह गया। अतोई के थके चेहरे पर संतोष की बेजान छाया लटक रही थी। जबकि उनींदी आँखों में वही पुरानी चमक। बायां हाथ पट्टी में लिपटा तो दायाँ पैर बैसाखी पर बावजूद वह मुस्कुरा रहा था। लिमा ने एक पल को अपनी सांसें रोकीं और फिर तेज़ स्वर में पुकारती उसकी ओर दौड़कर पहुँची। संकोच के पट्टे पीछे छोड़ अतोई से लिपट गई। बौखलाहट में बस इतना ही- “तू… तू ठीक है?” लिमा के शब्द आंसुओं में डूबे थे।
“हां, लिमा ! मैं पूरी तरह ठीक हूँ। मुझे मेरे पहाड़ों ने वापस बुला लिया।“ अतोई ने हल्के से हंसते हुए लिमा के बालों को बाहों में समेटे सहलाया तो आँखें नदी का शक्ल अख़्तियार कर लीं।
अतोई के आते ही उस रात, गांव का ‘जानी शिकार’ उत्सव जरा अधिक रंगीन हो गया। अतोई ने नुंगशी अंकल की बांसुरी उधार माँगी और अधर पर रख एक धुन बजा दी। वो धुन! धुंध के पार गई, पहाड़ों से टकराई और लिमा के दिल में हमेशा के लिए बस गई। आमा दूर खड़ी मुस्कुराती बोलीं- “देखा, पहाड़ अपने बच्चों को कभी तन्हा नहीं छोड़ते।”
“आमा ! पहली बारिश की जो सोंधी खुश्बू नदारत थी लेकिन अब मेरे दिल की दुनिया से विरानी छटने लगी है। मेरे यादों के जंगल आँखों में पनाह तलाश रहे हैं, ऐसे में आपकी वह बातें…आह ! आपकी बूढ़ाती आँखें अनुभव में धँसी हैं।”
पहाड़ों के पीठ पर लदे बादल झूम उठे। सोहर गाते पहाड़ के पेट में अचानक गड़गड़ की गुदगुदी उठी तो गाँव वालों के पेट में मद का नशा उतर आया… हर होंठ गा उठे- ‘नदियाँ चले, चले रे धारा, तुझको चलना होगा कि तुझको च… धुँध में घुन बजता रहा। हवा को चूमते पहाड़ी पायलिया रुंझुन- रुंझुन कर बजते रहे।

डॉ. सुनीता, प्रसिद्ध साहित्यकार, नई दिल्ली