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बेटियाँ

बेटियाँ घर की रौनक होती हैं चहकती, खिलखिलाती, और दिलों को जोड़ने वाली। बचपन से समझदार बनने तक, और विदाई के क्षण तक, वे अपनी यादें, प्यार और भावनाएँ एक संदुकची में समेटे चली जाती हैं।

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राखी के धागों में उलझा बाज़ार और बदलते रिश्तों का रंग

स्नेह के धागों से सिक्त भाई-बहन के बीच अटूट प्रेम का उत्सव है रक्षाबंधन। पर जिस तरह हर त्योहार बाज़ारवाद की भेंट चढ़ता जा रहा है, वहीं रक्षाबंधन का यह पावन पर्व भी इससे अछूता नहीं रह गया। शायद यही कारण है कि आज त्योहार मनाने से पहले हर किसी को अपनी जेब टटोलनी पड़ती है। आखिर, बाज़ार की चमक-दमक और महंगे से महंगे तोहफ़े खरीदने की होड़ ने आम आदमी के हृदय में उपजने वाली उत्सव की सहज भावनाओं को कहीं न कहीं दबा दिया है।

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धुंध में धुन

नागालैंड के एक छोटे से गांव की धुंधभरी सुबह में लिमा की आंखों में अपने खोए हुए भाई अतोई की यादें तैर रही थीं। पहाड़ों की खामोशी में उसे उसकी आवाज़ सुनाई देती थी। जब अचानक, उत्सव की रात धुंध में से अतोई की परछाई उभरी, तो लिमा की आँखों से बहते आंसुओं में उम्मीद की रोशनी चमक उठी। आमा की कहानियाँ और पहाड़ों का विश्वास सच हो गया—“पहाड़ अपने बच्चों को कभी तन्हा नहीं छोड़ते।”

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