कर्म का फल

रामलाल बहुत ही बुढ़ा था।उसके परिवार में बस एक पोता था,जिसे रामलाल ने बचपन से पाला पोसा और मेहनत करके पढ़ाया, लिखाया।बाहर उसे आगे की पढ़ाई के लिए उसने भेज दिया।वो एक अच्छा डॉक्टर बनना चाहता था,क्योंकि उसके माता-पिता की मृत्यु जिस बीमारी से हुई थी,गांव में भली भांति चिकित्सा नहीं होने की वजह से मृत्यु हो गई थी।वो डॉक्टर बनकर गांव में एक अस्पताल खोलना चाहता था।इसके लिए वो बाहर आगे की पढ़ाई के लिए चला गया। परंतु उसके पोते के संघर्ष को देखकर रामलाल कभी-कभी उदास हो जाता था,ये सोचकर की पता नहीं मेरे जीते जी मैं अपने पोते का सपना पूरा होता देख पाऊंगा या नहीं।
इतने पैसे भी नहीं है कि प्राइवेट से उसे आगे पढ़ाया जा सके।उनका पोता राकेश वहां काम भी करता था और अपनी पढ़ाई भी कर रहा था।
यही सोचते हुए वह पानी भरकर ले जा रहा था कि अचानक उसका घड़ा फूट गया था,उसे पता नहीं चला,रास्ते में सूखे पौधे थे,जिस पर उस घड़े से पानी गिरा और मुरझाए हुए फूल खिल उठे।अचानक इस दृश्य को देखकर रामलाल को सुकून प्राप्त हुआ। वो घर पहुंचा और घड़े को उतार कर वो बैठा ही था कि,उसने देखा कि उसका पोता आया है और खुशी से आकर उसने दादाजी के पैर छूकर उन्हें गले से लगा लिया,और कहा,”दादाजी आज आपका पोता डॉक्टर बन गया है और अब हम अपना सपना पूरा करेंगे,मेरी इच्छा है मैं यहीं अस्पताल खोलूं और यहां के लोगों का इलाज करूं!”
ये खबर सुन रामलाल खुशी से उछल पड़ा और उसके मन को शांति प्राप्त हुई उसने सोचा कि “आज जिस तरह से फूटे घड़े से सूखे पौधे पर पानी गिरा और वो पौधे खिल उठे,फूल भी खिल गये,वही खुशी आज भगवान ने मुझे दी है और वो आसमान की और देखकर ईश्वर को धन्यवाद देने लगा।
उसने यही सोच कि हमारा कोई भी किया हुआ कर्म हमें वापस जरूर मिलता है भले ही वह अनजाने में क्यों ना हुआ हो।

अनामिका मिश्रा, प्रसिद्ध साहित्यकार

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *