रोज़ थोड़ी-थोड़ी फिसलती है जिंदगी ज़नाब
कामयाबियों के चर्चे बेशक हों तुम्हारे
नाकामयाबियों से जब उलझे थे उनका भी देना होगा हिसाब
चैन से न रहने दे भई ज़माने की रीत है
अनचाहे सवालों के पूछे हैं ज़वाब
गुमां भला किस बात का सब ही तो खाक है
आहिस्ता-आहिस्ता उड़ जाता है शबाब
दूजे के गिरेबां में झांकने वालों जरा सुनो
अपनी भी करतूतों की खोल लेना किताब
फकीर अब तलक फकीर क्यों रहा
घर भर रहा उनका जो पहले से ही हैं नवाब
चापलूसी की चाशनी मीठा लगी उन्हें
सच को जो बोल दे हो जाते ख़राब
चाल तो हमेशा से अपनी एक ही रही
न टूटा है न टूटेगा अपना भी विश्वास

उमा पाटनी (अवनि), प्रसिद्ध साहित्यकार
पिथौरागढ (उत्तराखण्ड)
