अस्पताल में चिंतित पत्नी को सहारा देते संवेदनशील डॉक्टर का भावनात्मक दृश्य

दोस्त…डाक्टर…भगवान

एक गंभीर बीमारी के संकट में जब अपने भी दूर खड़े दिखाई देते हैं, तब किसी अनजान का अपनापन जीवन में उम्मीद की किरण बन जाता है। यह कहानी है संजना, रितेश और डॉक्टर नरेंद्र के बीच विश्वास, संवेदना और इंसानियत के उस रिश्ते की, जो मुश्किल समय में सच्चे सहारे का एहसास कराता है।

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एंटीडाट

हमारे समय की विडंबना यह है कि जो शिक्षा कभी आदर्शों का मंदिर थी, वही अब सौदेबाज़ी के गलियारों में बदलती जा रही है। मेडिकल डिग्री पाने की होड़ में लुटे गए विद्यार्थी, जब डॉक्टर बनकर समाज में उतरते हैं, तो कुछ सच में ईश्वर का रूप बनकर सेवा करते हैं, पर कुछ वही लूट की परंपरा विरासत में लेकर आगे बढ़ते दिखते हैं। बीमारी का इलाज तो मिलता है, पर कई बार इलाज जेब का भी हो जाता है। सेवा और मेवा के बीच की पतली रेखा धुंधली पड़ती जा रही है। ऐसे में सवाल यही उठता है. लालच की इस बीमारी का असली “एंटीडाट” आखिर कहाँ मिलेगा?…….
मधु चौधरी की एक व्यंग्य रचना

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जरूरी

दामोदर ने कहा, “शहर में तीन दिन से कर्फ्यू था। आज हटते ही दो सौ रुपए की मजदूरी हुई। कल बाबा का श्राद्ध है, कुछ किराना ले आता हूँ।”
पत्नी ने चिंता जताई, “अम्मा की तबियत देख लो, पांच बार उल्टी की और बुखार भी तेज है।”
दामोदर ने पूछा, “फिर क्या करूँ?”
पत्नी ने कहा, “नुक्कड़ वाले डॉक्टर साहब के पास चलो। इलाज जरूरी है।”दामोदर ने मान लिया, “हाँ, सही है। पहले अम्मा का इलाज।”

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नेत्रदान और देहदान कर अमर हो गईं सुशीला दिवेकर

धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के बचाय अपने चिकित्सकीय प्रोफेशन को सर्वोपरि मानते हुए चिकित्सा अधिकारी डॉ. रवि दिवेकर ने अपनी माता सुशीला दिवेकर की पार्थिव देह दान कर दी। इससे पहले 77 वर्षीय दिवेकर के नेत्रदान भी कराए गए। प्रशासन और पुलिस ने ऐसी देहदानी को गार्ड ऑफ ऑनर देकर अंतिम विदाई दी। शासकीय मेडिकल कॉलेज की डीन और वरिष्ठ चिकित्सकों ने इसे अनुकरणीय इतिहास के पन्नों में दर्ज होने वाली घटना बताया।

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