यह बात साल 1977 की है। महिदपुर रोड के जीवन में जब नवरात्रि आता था, तो उसका मतलब होता था – रामलीला। यह कोई साधारण धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे कस्बे की धड़कन हुआ करता था। बड़ी होटल वालों (पोरवाल ब्रदर्स) के घर के सामने की खुली जगह उस समय रामलीला मैदान कहलाती थी।
इस रामलीला के आयोजन की जिम्मेदारी शहर के पंजाबी समाज के कंधों पर होती थी। प्रीतमलाल जी सहित कई समाजसेवी इसमें तन-मन से जुटे रहते थे। रामलीला की तैयारी और प्रचार-प्रसार महीनों पहले शुरू हो जाता था, और जैसे-जैसे नवरात्रि पास आती, शहर का उत्साह चरम पर पहुंच जाता।
रामलीला के लिए कलाकार विशेष रूप से राजस्थान के नागौर, उदयपुर आदि स्थानों से बुलाए जाते थे। इनमें से मुझे आज भी एक रामलीला मंडली का नाम याद है – शिव की रामलीला पार्टी। इस पार्टी की पहचान दो कारणों से थी – एक, उनके रंग-बिरंगे पर्दे, जिनमें राजमहल से लेकर पंचवटी और अशोक वाटिका तक की झलक हूबहू उकेरी जाती थी; और दूसरा, खुद शिवजी द्वारा निभाया गया रावण का जीवंत पात्र। उस रावण की आभा और संवाद अदायगी का प्रभाव ऐसा होता था कि बाद में रामानंद सागर की रामायण में अरविंद त्रिवेदी का रावण ही उसकी बराबरी कर सका।
रामलीला की खास बात यह थी कि यह सबके लिए निशुल्क होती थी। लेकिन इसे देखने का उत्साह ऐसा होता था कि लोग दोपहर 3 बजे ही अपना टाट का थैला बिछाकर रात 8 बजे वाली रामलीला के लिए जगह बुक कर आते थे। यह फर्स्ट कम, फर्स्ट सर्व का असली उदाहरण था। स्कूल जाते समय हम भी टाट का कट्टा बैग में डालकर ले जाते थे और छुट्टी के बाद सीधा मैदान में अपनी सीट तय कर आते थे। हाँ, कई बार कुछ दबंग टाइप लड़के हमारे कट्टे फेंक देते और अपनी जगह बना लेते थे, लेकिन यह भी स्वीकार्य था, क्योंकि रामलीला देखना ही सबसे बड़ी बात होती थी।
कार्यक्रम पूर्ण अनुशासन के साथ होता था। रस्सी से महिलाओं और पुरुषों का अलग-अलग स्थान सुनिश्चित किया गया था – महिलाएं बड़ी होटल की ओर और पुरुष सड़क की दिशा में बैठते थे। रामलीला के आरंभ में जब “श्रीरामचंद्र कृपालु भजमन…” की स्तुति होती, तो उसका प्रभाव इतना गहरा होता कि बच्चों को यह नौ दिन में कंठस्थ हो जाती।
रामलीला के बीच में एक छोटा इंटरवल भी होता था – ‘भेंट का समय’। इस दौरान लोग यथाशक्ति दान करते थे, जिसे प्रीतमलाल जी पंजाबी प्रेरित करते थे। संचालन भी वही किया करते थे – स्वर में शांति, शब्दों में आग्रह और चेहरे पर आत्मीयता।
रामलीला का समापन दिन सबसे विशेष होता था – रावण दहन। यह कार्यक्रम डाक बंगले के पास, जहां अब कृषि उपज मंडी है, आयोजित होता था। इससे पहले श्रीराम मंदिर से भव्य शोभायात्रा निकाली जाती थी, जिसमें राम-रावण युद्ध की जीवंत झांकी होती थी। रावण का पात्र प्राय: गुड़वाले चाचाजी निभाते थे, जिनका असली नाम अब याद नहीं, लेकिन चेहरा आज भी स्मृति में है।
हनुमानजी के दृश्य विशेष लोकप्रिय होते थे। केले और फल पेड़ों पर लटकाकर अशोक वाटिका का दृश्य तैयार किया जाता था। हनुमानजी इन फलों को तोड़कर फेंकते और कई बार दर्शकों की ओर भी उछाल देते – जिसे लोग श्रद्धा से हनुमानजी का प्रसाद मान लेते। कभी-कभी उनकी पूंछ ‘हंटर’ बनकर दर्शकों तक भी पहुंच जाती, लेकिन कोई नाराज नहीं होता – उलटे आनंद ही लेता।
इस नौ-दिवसीय आयोजन का एक भावात्मक पहलू यह भी था कि इन पात्रों से इतना लगाव हो जाता था कि उन्हें बिना गेटअप के भी देखना अच्छा लगता। वे दिन में बाजार में या नल पर पानी भरते भी मिल जाते, लेकिन हमारे लिए वे हमेशा राम, लक्ष्मण, रावण और हनुमान ही रहते। एक बार किसी पात्र की तबीयत खराब होने के कारण उसकी जगह किसी और ने वह भूमिका निभाई, तो मन दुखी हो गया – जैसे किसी अपने की जगह कोई अजनबी आ गया हो।
रामलीला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं थी, वह हमारा उत्सव था, परंपरा थी, अपनापन था – एक सालाना त्योहार जो हर आयु, जाति और वर्ग के लोगों को एक समान आनंद देता था। आज जब पंडाल, मंच और मोबाइल की दुनिया बदल गई है, तब यह स्मृति और भी मूल्यवान लगती है।

सुरेश परिहार, पुणे