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कार्यशाला में शामिल विद्यार्थी और विशेषज्ञ, सांस्कृतिक विरासत संरक्षण पर चर्चा करते हुए।

हेरिटेज से शिक्षा का संगम

राजकीय महाविद्यालय पनारसा में आयोजित 7 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का उद्देश्य विद्यार्थियों को सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूक करना है। कार्यक्रम में भारत सहित कई देशों के प्रतिभागी शामिल हो रहे हैं।

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ढाक बाजा, धुनुची और सिंदुर खेला के रंगों में रंगा बोरीवली

अष्टमी के अवसर पर बोरीवली पूर्व स्थित एवान एंक्लेव सोसायटी की महिलाओं ने पारंपरिक बंगाली वेशभूषा में मां दुर्गा की आराधना हेतु नृत्य प्रस्तुत कर कोलकाता की दुर्गा पूजा की झलक मुंबई में साकार कर दी। बारिश के बावजूद उनका उत्साह देखने लायक था। विभिन्न सम्प्रदायों से जुड़ी महिलाओं ने मिलकर यह नृत्य तैयार किया, जिसमें दुर्गा पूजा के धार्मिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक पहलुओं को सुंदरता से प्रस्तुत किया गया। मां दुर्गा के रूप में सजी अश्विका और बाल कलाकारों की भूमिकाओं ने कार्यक्रम को जीवंत बना दिया। दर्शक भाव-विभोर हो उठे और एवान एंक्लेव का पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।

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संतोष कुमार झा का कविता संग्रह “स्याही का सिपाही”

हिंदी दिवस के अवसर पर गांधीनगर, गुजरात में आयोजित 5वें अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन के दौरान कोंकण रेलवे कॉर्पोरेशन लिमिटेड (केआरसीएल) के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक संतोष कुमार झा के चौथे काव्य संग्रह “स्याही का सिपाही” का विमोचन किया गया। पुस्तक का विमोचन भारत सरकार के केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, राज्यसभा सांसद डॉ. दिनेश शर्मा, वैज्ञानिक डॉ. आनंद रंगनाथन और भारत सरकार की सचिव (राजभाषा) श्रीमती अंशुलि आर्या द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।

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लेखन मेज़ पर बैठे कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद, पृष्ठभूमि में लमही गाँव और उनकी साहित्यिक विरासत को दर्शाता यथार्थवादी दृश्य।

ये कैसा दिवस?

हर वर्ष हम माता-पिता दिवस मनाते हैं, हिंदी दिवस मनाते हैं, और इसी तरह कई अन्य दिवस भी मनाते हैं। इन्हीं में एक दिन हम कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का जन्म दिवस भी मना लेते हैं। फिर सब कुछ समाप्त। क्या एक दिन का स्मरण उनके सम्मान के लिए पर्याप्त है? हम कभी यह सोच भी नहीं पाते कि जिस तरह बंगाल ने रवींद्रनाथ टैगोर के गीत, संगीत, कला और साहित्य को न केवल सहेज कर रखा है, बल्कि उसे अपनी जीवनशैली में आत्मसात किया है — उसी तरह हमें भी अपने साहित्यकारों को सम्मान देना चाहिए। बंगाल का समाज अपने बच्चों को, आधुनिक होते परिवेश में भी, रवींद्रनाथ के प्रति सम्मान भाव से परिचित कराता है। समय-समय पर उनके सम्मान में आयोजन होते हैं।

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बंगलौर में मिथिला महोत्सव:

“बंगलौर की धरती पर मिथिला समाज ने पहली बार संगठित होकर अपनी सांस्कृतिक शक्ति का एहसास कराया। पान, माछ, मखान के स्वाद और धरती से जुड़ने की परंपरा ने यह साबित कर दिया कि अपनी जड़ों से जुड़कर ही पहचान बचती है।”

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रामलीला: एक प्रतीक्षा, एक परंपरा, एक अपनापन

साल 1977 की यह रामलीला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि महिदपुर रोड की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान थी। रंग-बिरंगे पर्दों, अनुशासनपूर्ण व्यवस्था और जीवंत पात्रों वाली यह रामलीला आज भी स्मृतियों में जीवित है, जब लोग दोपहर में ही रात की सीट बुक करने चले जाते थे, और हनुमानजी का प्रसाद पूंछ से मिलता था।

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