शून्य सा वज़ूद रखा कीजिए 

इंसान करोड़ों कमा कर खुश होता है..
लाइफस्टाइल बदलकर खुश होता है.! महंगी गाड़ियां कपड़े और महंगे शौक पाल कर स्वयं को सर्व संपन्न मानता है ! जैसे उससे ज्यादा धनी और उससे बढकर टाटा बिड़ला कोई नहीं वह अपने से दो कदम पीछे की पायदान वाले लोगों से बात करने में शर्म महसूस करता है.! स्वयं का कार्य अपने हाथों से करने में शर्म महसूस करता है….!कैसी अजीब विडंबना है …!
जो इंसान स्वयं को करोड़पति और अरबपति समझता है जिसके लिए केवल कुछ शून्यों का हेरफेर है जो उस एक शून्य के आगे बढ़ते जाते हैं लेकिन! यही शून्य उसके इस व्यवहार परिवर्तन के कारण उसके व्यक्तित्व में लगे शून्य को घटा देते हैं जिसके कारण शायद उससे ज्यादा दरिद्र फिर कोई नहीं, ऐसा व्यक्ति किसी को भी साथ लेकर चलना पसंद नहीं करता सिर्फ उसका ओहदा उसका अहंकार और वह स्वयं यानि एक ही रह जाता है.
शायद यहां आप मेरे द्वारा दिए गए उपरोक्त वाक्यों का औचित्य समझ गए होंगे क्या महज़ एक करोडपति इंसान वह है जिसकी मासिक आय में शून्य बढ़ते जाएं ! जो दान भी करे तो सिर्फ इनकम टैक्स से बचने हेतु ! और उसका प्रचार प्रसार मात्र वाहवाही लूटने हेतु!
महंगे शौक ….!! ,आसमान को छूती .. कोठी और बंगला जहां से निकलने वाले लोग महज़ उसे इस लिए याद करें कि वह एक करोड़पति है..!
यदि आप यह कहे कि ! करोड़पति होकर भी लोगों के बीच जाकर पूछ तो रहा है…!! लोगों को दान तो कर रहा है ….!! तो माफ कीजिएगा ! फिर आप भी इस कलयुगी संकीर्ण सोच का एक हिस्सा है.!
जरा सोचकर देखिए! इस मानसिकता को जन्म देने वाले हम स्वयं ही हैं. माना कि ! ईर्ष्या, क्रोध ,लोभ, लालच नामक शत्रु हर मनुष्य के मन मस्तिष्क के दरवाजे पर हर
वक्त दस्तक देता ही रहता है किंतु उनको अंदर प्रविष्ट करवाने की भूमिका कौन निभा रहा है?
हम स्वयं ही उन्हें उजागर कर निभा रहे. इसमें करने वाले और करवाने वाला दोनों ही शामिल होते हैं ऐसा कर ,करने वाले ने वाहवाही तो लूट ली उसका नाम हो गया लोगों की नजरों में भी और उस ईश्वर की नजरों में भी. वह सोचता कि यह उसका एक फिक्स डिपाजिट है जिससे जीवन के अंत में तो लाभ मिलेगा ही किंतु वर्तमान में साथ- साथ भी लाभ प्राप्ति की व्यवस्था बनी रहेगी.
क्या इसको अमीरी कहते है?
संस्कार कहते हैं? धर्म ,आस्था दान के नाम पर जो प्रचार प्रसार किया जाता यही धार्मिकता है? सिर्फ ईश्वर को खुश करने के लिए तो मैं कहती हूं…कतई भी नहीं..!!
मेरा मानना है कि! ऐसा नहीं होता है! ऐसा कर मनुष्य केवल और केवल अपने स्वार्थ सिद्धि करता है. स्वयं को खुश रखता क्योंकि! किसी से छुपा कर अकेले में बिना किसी को बताए दान कर्म करने में तसल्ली नहीं मिलेगी उसको. दुनिया कैसे जानेगी..? जब तक भीड़ इकट्ठी ना हो जाए! तो क्या! यह भीड़ कल वक्त पलटने के बाद भी आपके पास जब देने के लिए कुछ नहीं होगा क्या इकट्ठा होगी?
क्या प्रचार प्रसार कर पाएगी ! कि, देखो मैंने वह सब किया इसलिए सब मेरे साथ हैं ..नहीं..!!
… कदापि नहीं! और ऐसा इसलिए नहीं होगा कि! वह समय बदल गया . जिस समय आप अपनी शान के लिए उन्हें जो दे रहे थे जो दिखावे की भीड़ जोड़ रहे थे वे केवल लालच वश् आपका समर्थन कर रहे थे .आपके कर्मों का नहीं केवल आपसे मिलने वाले धन का जिसे आप बांट कर अपनी महंगी गाड़ी में बैठकर रवाना हो जाते हैं्.
आप अपने सामान्य कार्यों के लिए भी अन्य लोगों पर निर्भर रहते आपका ड्राइवर आपका घर आपके घर में सभी का जीवन आप इसी प्रकार का बना लेते हैं.
एक मिट्टी से उठा हुआ इंसान जिसने अंत में उस मिट्टी में मिलना है वह मिट्टी में पैर रखना तो दूर , अपने स्वयं के कार्य करने में भी शर्म महसूस करता है और दूसरों को ऐसा करता हुआ देख हीन समझता है कितनी बड़ी विडंबना है कि इतनी बड़ी गलतफहमी् पालकर वह अंत तक जीता है ,इस राख और मिट्टी से बने तन पर घमंड करता है.सहेजता है शानो-शौकत अपने रुतबे और दौलत के बलबूते पर और अपने से सामान्य लोगों से मन ही मन बस ईर्ष्या करता है.
अंत में यही कहना चाहूंगी कि शून्य-सा वज़ूद रखा कीजिए क्योंकि शून्य की स्वयं की कोई कीमत नहीं न ही रखनी चाहिए अपितु वह तो जिस किसी के साथ जुड़े उसकी कीमत बढ़ा दे.

सीमा शर्मा “तमन्ना”

नोएडा उत्तर प्रदेश

One thought on “शून्य सा वज़ूद रखा कीजिए 

  1. सही कहा आपने 🙏 इस पर कुछ पंक्तियां है मेरी जो आप कैसे लेख पर सटीक बैठती हैं
    हम सब पुतले माटी के
    माटी में मिल जाएंगे
    क्या तेरा है क्या मेरा है
    बस यही करते रह जाएंगे।

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