भारत से पॉटरी एंड सिरामिक में मास्टर्स करने वाली पहली महिला ममता सिंह देवा से सृजन, संघर्ष, प्रेम, विद्रोह और स्त्री के सच पर एक आत्मीय बातचीत.

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
मिट्टी को आकार देने वाले हाथ जब शब्दों में जीवन का सच उकेरते हैं, तो सृजन की एक अनोखी यात्रा जन्म लेती है। ममता सिंह देवा की कहानी भी ऐसी ही है. पॉटरी के चाक से कविता के शब्दों तक, अठारह साल के अंतराल से पुनः सृजन तक और स्त्री की चुप्पियों से विद्रोही स्वर तक। भारत में पॉटरी एंड सिरामिक में मास्टर्स करने वाली पहली महिला ममता सिंह देवा ने कला और साहित्य, दोनों क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी रचनाओं में स्त्री-संवेदना, प्रेम, संघर्ष और बेबाक सच एक साथ दिखाई देते हैं। उनकी इसी बहुआयामी रचनात्मक यात्रा पर उनसे हुई यह आत्मीय बातचीत-
प्रश्न-आप भारत से पॉटरी एंड सिरामिक में मास्टर्स करने वाली पहली महिला हैं| उस दौर में जब इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी आज की तुलना में बहुत कम थी, तब इस विषय को चुनने के पीछे कौन-सी बेचैनी या सपना था?
उत्तर – मैं भाग्यशाली हूं कि मैं भारत से पॉटरी एंड सिरामिक में मास्टर्स करने वाली पहली महिला हूं क्योंकि जब इस विषय में भारत में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के दृश्य कला संकाय में मास्टर्स शुरू हुआ तब मैं बैचलर ऑफ फाइन आर्ट्स में पंचम वर्ष की छात्रा थी और पहले बैच में मुझसे पांच, तीन और दो साल सिनियर छात्रों का ऑल इंडिया काॅम्पटीशन के तहत तीन छात्रों का चयन हुआ। दुसरे बैच में मेरे साथ सिनियर लोगों ने भी इंट्रेंस एक्जाम दिया जिससे एक महिला भी थीं लेकिन चयन मेरा हुआ। चार साल बाद शांति निकेतन में भी मास्टर्स की शुरुआत हुई ।इस क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों के अपेक्षा कम थीं जैसे – निर्मला पटवर्धन, ईरा चौधरी ( प्रसिद्ध मुर्तिकार पद्मश्री शंखो चौधरी की पत्नी ), ज्योत्स्ना भट्ट इत्यादि।
मुझे जब इस संस्था में प्रवेश मिला तो मैं टैक्सटाइल के लिए मन बना कर आई थी क्योंकि मुझे फै़ैशन डिज़ााइनिंग में दिलचस्पी थी लेकिन फर्स्ट और सैकेंड इयर की पढ़ाई जिसके अंतर्गत पेंटिंग, स्कल्पचर, पाॅपरी, टैक्सटाइल, कमर्शियल आर्ट की पढ़ाई करते हुए मेरे अध्यापकों को ये लगा कि मेरी पाॅटरी बहुत अच्छी है और मैंने देखा कि मेरी ड्राइंग बहुत अच्छी नहीं है तो मैं पेंटिंग और कमर्शियल आर्ट में खो जाउंगी रही टेक्स्टाइल की बात तो एडमिशन के बाद पता चला कि टेक्स्टाइल तो NID अहमदाबाद की अच्छी मानी जाती है । उस वक्त पाॅटरी में दो ही सीट हुआ करती थी जो नम्बर के आधार पर मिलती थी मुझे नम्बर भी मिला और सीट भी मिली ।
हमारे समय में पूरे भारत में हमारे संकाय का पाॅटरी डिपार्टमेंट बेस्ट हुआ करता था और मेरे गुरु स्वर्गीय श्री के. वी. जेना जी को पाॅटरी का भीष्म पितामह कहा जाता था मेरी अम्मां आटे से बहुत अच्छे खिलौने बनाती थीं मगरमच्छ को चावल के दांत लगाकर बेहद खूबसूरत बना देती थीं । अम्मां की कला मुझमें उतर गई । मेरा सपना था भीड़ से अलग दिखना और मुझे लगा कि मैं अपने अच्छे काम के साथ अलग दिख सकती हूं इस विश्वास के साथ मैंने पाॅटरी को चुना .

प्रश्न-काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से और करने के दौरान आपको नेशनल कल्चरल स्कॉलरशिप मिली| एक युवा कलाकार के रूप में उस सम्मान ने आपके आत्मविश्वास और आपकी कलात्मक दिशा को किस तरह प्रभावित किया?
उत्तर -हमारे समय में स्कालरशिप वर्क के फोटोग्राफ के ज़रिए HRD Ministry से जजिंग होती थी और पाॅटरी में पूरे भारत में हर साल एक ही स्कालरशिप मिलती थी ऐसे में स्कालरशिप मिलना किसी के लिए भी बेहद सम्मान की बात थी और इस सम्मान से मुझमें काम करने का एक नया आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ मुझे लगा कि मेरा काम मेरी डिजा़ाइन अलग हटकर हैं और मुझे इस पर और ज़्यादा ध्यान देना है । काम करने का एक नया जज़्बा मेरे अंदर जोश मारने लगा ।

प्रश्न-विवाह के बाद लगभग 18 वर्षों का लंबा अंतराल आपके कला-सफर में आया| फिर जब आपने आकार स्टूडियो स्थापित करके दोबारा सृजन शुरू किया, तो क्या आपको लगा कि आप अपनी अधूरी रह गई पहचान को फिर से गढ़ रही हैं?
उत्तर -कहते हैं कोई का अगर रूक जाए तो उसको दुबारा शुरू करने में बहुत हिम्मत की ज़रूरत होती है पाॅटरी में तो हिम्मत के साथ मेहनत और पूरा स्टूडियो सैटअप चाहिए होता है । फर्नेस, राॅ मेटिरियल, आक्साइड्स, मशीनरी, टूल्स इत्यादि। मेरा काम दो-चार सालों के लिए नहीं रूका था बल्कि पूरे अट्ठारह सालों का अंतराल था । एक डर भी था इसलिए मैंने दिल्ली जाकर पंद्रह दिन ” Delhi Blue Pottery ” में काम किया जिससे मेरा धड़का खुल सके और मैं अपनी पहचान के साथ इस लंबे अंतराल को अपने सृजन से भर सकूं और ऐसा हुआ भी मेरी फर्नेस के निकला मेरा पहला काम ” Travelled In Time ” 56th National Exhibition Of Art ( Lalit Kala Akademi, New Delhi 2014-15 ) में सेलेक्ट हुआ और AIFACS का लगातार दो साल का ” Potter Of The Year ” का अवार्ड मिला और Ministry of culture से Senior Felloship प्रदान की गई ( पूरे भारत में हर साल एक ही Senior Felloship प्रदान की जाती है ) और मैं रूकी हुई पहचान को फिर से गढ़ने लगी ।

प्रश्न-आप मिट्टी को आकार देती हैं और शब्दों को भी| आपके लिए इन दोनों रचनात्मक प्रक्रियाओं में क्या समानता है? क्या कभी ऐसा हुआ कि किसी कविता ने किसी कलाकृति का रूप लिया हो या किसी कलाकृति ने कविता को जन्म दिया हो?
उत्तर -मिट्टी को आकार देने से पहले मैंने शब्दों को आकार देना ( 1982 ) शुरू कर दिया था। मिट्टी में आकार देते वक्त मैंने उसमें अपने शब्दों को ढालकर दोनों का तालमेल बैठाया। मैंने अपनी एक कविता ” सपने बोरियों में ” को एक सेरामिक स्क्पल्पचर के ज़रिए सार्थक किया । मेरे एक सेरामिक स्कल्पचर ” Inhumanity Of Female Foteticide ” का मेरी कविता ” कन्या बलि ” का जन्म हुआ ।
प्रश्न- आपने कविताएँ लिखना 1982 में ही शुरू कर दिया था और यह संवेदना आपको अपनी माँ से मिली| आपकी माँ और आपके शुरुआती साहित्यिक संस्कारों ने आपकी लेखनी को किस तरह प्रभावित किया?
उत्तर -मेरी पहली कविता ने अम्मां की डांट पड़ने पर ही आकार लिया था अम्मां आशू कवि थीं ये प्रभाव भी मुझमें गहरे से उतरा है वो जो भी आस-पास देखती थीं वो लिखती थीं मैं एक कदम आगे निकली मैंने जो जीया वो भी लिखा । किताबें पढ़ने का शौक था जिस कवि की कविताएं पसंद आती वो डायरी में लिख लेती । मैं कविता के ज़रिए ख़ुद को अभिव्यक्त कर पा रही थी ये बात मेरे लिए ख़ास थी, महादेवी वर्मा जी ने इलाहाबाद में जिस स्कूल से शिक्षा प्राप्त की थी ” क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज ” उसी स्कूल से मैंने भी दो साल ( कक्षा 6-7 ) शिक्षा ग्रहण किया शायद उसका प्रभाव हो । साहित्यिक संस्काकारों ने मेरी लेखनी को ताकत दी अच्छा लिखने की प्रेरणा दी ।

मेरी पहली कविता –
” वक़्त से “
तुम रहते हो तो मैं
आशाओं के पुल बनाने लगती हूँ
खुशियोंकी लकीरें खीचने लगती हूँ
कि शायदतुम रूको
इसी उम्मीद में दिन गुजर जाते हैं
लेकिन तुम नहीं रूकते
और मेरे आँसू निकल आते हैं ,
तुम्हारे जाते ही मेरे पुल
जो आशाओं के खम्भों पर टिके हैं
वो लड़खड़ा कर गिर जाते हैं
खुशियों की लकीरें
मेरे आँसूओं से मिट जाती हैं
लेकिन तुम नहीं रूकते ,
सोचती हूँ तुम क्यों नहीं
एक बार रूक कर
मेरे आँसू अपने हाथों से पोछ कर
मेरे साथ आशाओं का
कभी ना टूटने वाला पुल बनाते
खुशियोंकी कभी ना मिटने वाली
लकीरें खीचते
सिर्फ एक बार रूक कर ।
प्रश्न- आपकी तीन काव्य-कृतियों गढ़ते शब्द, विद्रोह शब्दों का और शब्दों को हद पता है के शीर्षक ही आपकी रचनात्मक यात्रा के अलग-अलग पड़ावों का संकेत देते हैं| इन तीनों पुस्तकों के बीच ममता सिंह देवा की कवयित्री में क्या बदलाव आया है? उत्तर -मेरा पहला काव्य संग्रह ” गढ़ते शब्द ” में मेरी पहली कविता से शुरू हुई है और आखिरी कविता के बीच का अंतर लोगों को समझ आए इसलिए मैंने सारी कविताओं को क्रमबद्ध रखा । बाद के दोनों संग्रहों में मैंने कविताओं को चयन करके प्रकाशक को दिया । मुझे लगता है मुझमें लेखन के विषयों को लेकर कोई बदलाव नहीं आया मेरी लेखनी पहले और वर्तमान में बेबाक और धारदार ही रही हां लेखन थोड़ा और परिपक्व हुआ। यही कहूंगी की…

परिस्थितियां वक़्त के
हिसाब से
इतनी जल्दी
बदलती हैं कि
जो कभी पहाड़ सा
भारी लगता था
आज वो हिमालय सा
महान लगने लगा ।
प्रश्न- आपने कविता से लेकर लघुकथा, कहानी, संस्मरण, लेख, हाइकु, कहमुकरी, सायली, लौटती कविता, गीत, भजन और बाल साहित्य तक लगभग हर विधा को छुआ है| इतनी विधाओं में लिखते समय क्या आपको लगता है कि हर विधा के लिए लेखक को अपना अलग शिल्प और मानसिक संसार बनाना पड़ता है?
उत्तर –कविता और कहानी में कोई रोक-टोक नहीं होती लेकिन और भी जिन विधाओं में मैंने लेखन किया वो नियमों के तहत थीं इसलिए उनको लिखते समय उनको अमल में लाने के लिए उन विधाओं के मानसिक संसार में घुसना पड़ता है और उनको सही तरीके से गढ़ना पड़ता है जिसका मैंने सीखने का भरकम प्रयास किया है और सीखा भी क्योंकि जब आप कुछ सीखते हैं तो बेहद जटिल लगती है लेकिन सीखने के बाद आसान सी लगती है ।
प्रश्न- आपकी रचनाओं में विद्रोह भी है और प्रेम भी| एक महिला रचनाकार के रूप में आपके लिए विद्रोह का अर्थ क्या है व्यवस्था के विरुद्ध आवाज़ उठाना, अपनी पहचान के लिए संघर्ष करना या भीतर की चुप्पियों को तोड़ना?
उत्तर –जहां प्रेम होता है विद्रोह भी वहीं जन्म लेता है और मैंने अपने शब्दों के माध्यम से व्यवस्था, ज्वलंत मुद्दों पर अपनी आवाज़ उठाई जो मेरी पहचान के संघर्ष को बखूबी दर्शाता है । मैंने अपनी चुप्पियों को तोड़ने के लिए इस विधा को अपना सशक्त माध्यम बनाया।
लिखना वही
जो सच में सच हो
ना कि किसी की
चापलूसी में कही हो
तेरे सच से भले ही
लोग तिलमिला जाएं
तेरे शब्दों की धार से
वो एकदम बिलबिला जाएं
कभी भी उनकी
तुम परवाह नहीं करना
अपनी लेखनी में हमेशा
ऐसी ही तेज़ धार रखना ।

प्रश्न-आपको अमृता प्रीतम कवयित्री सम्मान सहित कई सम्मान मिले हैं और आपकी रचनाएँ अनेक साझा संकलनों में प्रकाशित हुई हैं| आपके लिए सम्मान अधिक महत्वपूर्ण है या पाठक की वह प्रतिक्रिया, जब कोई आपकी रचना पढ़कर कहे. यह तो मेरी ही कहानी है?
उत्तर -मेरे लिए हमेशा महत्वपूर्ण पाठकों की प्रतिक्रिया रही है बहुत सी महिलाओं ने कहा कि हम लिख नहीं सकते आपने तो मेरी कहानी कह दी यहां तक की लेखिकाओं ने ये कहा कि हम लिखते हैं लेकिन आप जैसा सच नहीं लिख पाते हैं क्योंकि हम डरते हैं लेकिन आपको पढ़कर एक सुकून मिलता है लगता है हमारे दर्द को आपने अपने शब्दों से बयां कर दिया। इतना बहुत होता है एक लेखक की लेखनी के लिए।
मैं सच लिखती हूॅं….
अपना सहा हुआ
दूसरों का कहा हुआ ,
स्त्रियों का दर्द समझती हूॅं
अपनी लेखनी को उनसे जोड़ती हूॅं ,
उनका थोड़ा भी दर्द अगर बयां कर पाती हूॅं
तो ख़ुद को खुशकिस्मत समझ पाती हूॅं ,
दर्द लिखने का मतलब नफरत नहीं है
बस मेरी लेखनी में कोई मुरव्वत नहीं है ,
फिर भी कोशिश करती हूॅं की सच कम ही लिखूं
शीशे सा सच उकेरती कम ही दिखूं ,
इतना ही पढ़कर लोग हड़बड़ा जाते हैं
मेरे बेबाक सच से घबड़ा जाते हैं ,
कहते हैं मुझको ऐसी भी क्या नाराज़गी है ज़माने से
वो नहीं जानते ज़माना हमसे है हम नहीं ज़माने से ,
मैं एक अनोखा अभियान चला रही हूॅं
सबको सबका छुपा सच बता रही हूॅं ,
एक भी स्त्री कहती है आपने मेरे मन की कह दी
ये कहकर उसने मेरी लेखनी सार्थक कर दी ,
सच लिखना सबके बस की बात नहीं होती
इसको लिखने की सबकी बिसात नहीं होती ,
हूज़ूर ज़िगर लहूलुहान करके ये हिम्मत आती है
तभी तो अपने जैसों की बात समझ आती है ,
यूं ही हवा में दर्द के पुलिंदे नहीं बनाती हूॅं
इसे हक़ीक़त में कराहते हुए शब्दों से सजाती हूॅं ,
सब पढ़ पायें मेरा और उनका दर्द भोगा हुआ
पन्ना थोड़ा सा ही है पर है दर्द में डूबा हुआ ,
खैरियत मनाइए की सबका सोच कर लिखती हूॅं
इसलिए थोड़ा-थोड़ा सा सच ही मैं कहती हूॅं ,
अगर जो मैं पूरा सच लिख दूं तो क्या हाल होगा
मेरे दिल की तरह मेरा पन्ना भी पूरा लाल होगा ।
प्रश्न-पॉटरी के चाक से लेकर कविता के शब्दों तक और स्टूडियो आकार से लेकर यू ट्यूब के नैरेशन तक आपकी रचनात्मक यात्रा लगातार नए रूप लेती रही है| आज अगर आपको अपनी पूरी यात्रा को एक ही शब्द में परिभाषित करना हो, तो वह शब्द क्या होगा सृजन संघर्ष, विद्रोह, पुनर्जन्म या कुछ और? और क्यों?
उत्तर –ये ज़िन्दगी है और कहते हैं कि इंसान का जन्म चौरासी लाख योनियों के बाद होता है इतनी मुश्किल से मिलने वाले जन्म में ” संतुष्टि ” जैसा शब्द होना ही चाहिए इसलिए जो यात्रा अभी अनवरत जारी है अभी जीवन के बहुत से आयाम बचे हैं इसलिए परिभाषित करना आसान नहीं है आपने पूछा है तो जवाबदारी बनती है तो मैं कहूंगी – सृजन में संघर्ष के माध्यम से विद्रोह , वैसे लोग मुझे विद्रोहिणी कवियत्री कहते हैं और ये विद्रोह मेरे मिट्टी के सृजन में भी दिखता है ।
संभलकर कदम रखना तुम
ख़ुद को संभालना तुम्हें ही है
क्योंकि ज़माना तो
तेल और माचिस लेकर
इंतज़ार में खड़ा है ।
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एक लेखिका, एक मार्गदर्शक: विजया डालमिया

अनेकों उतार चढाव के बावजूद, बहुत ही सीधा सपाट, बहुमुखी और मुखर व्यक्तित्व है। कला और साहित्य यात्रा के लिए शुभकामनाएं।
Thank you Rajesh 😍
ममता सिंह देवा जी की ‘ पाटरी’ यात्रा ‘ उनकी प्रतिभा और लगन को परिलक्षित करती है..!
बहुत सुन्दर साक्षात्कार 💐🌹
Thank you Kamlesh ji 🙏
सत्यता से परिपूर्ण प्रेरित करने वाला बेहतरीन संवाद
अशेष शुभकानाएं दी 💐 💐
Thank you Anonymous 😍
विस्तृत साक्षात्कार ❤️तस्वीरों में सहेजे अद्भुत कलाकारी को सामने से देखने का सौभाग्य मिला है ✨ सेरेमिक की अलग ही दुनिया है ❤️
Thank you Moshmi 😍
मेरा साक्षात्कार लेकर प्रकाशित करने के लिए हृदय से आभार सुरेश जी 🙏
Congratulations di 🙏💐👌
Thank you Aparna 😍