
अनिशा छेत्री, गंगटोक (पीएचडी स्कॉलर, सिक्किम यूनिवर्सिटी)
तुम एक ऐसी लड़की बनना,
जिसे सिंगार भी आए और संघर्ष भी,
जो फूलों-सी सजे तो खूबसूरत लगे,
और मुश्किलों में उतरे तो
चट्टान-सी अडिग भी रहे।
तुम ऐसी लड़की बनना,
जो दूसरों को चुनने से पहले
खुद को चुने,
जो किसी के सहारे की प्रतीक्षा करने से पहले
अपने पैरों पर खड़ा होना सीखे।
किसी धनवान पति की तलाश में निकलने से पहले,
खुद अपने सपनों की अमीरी कमाना,
कोई हाथ थामे तो साथ निभाना,
पर किसी के धन पर अपना जीवन न सजाना।
तुम स्वयं में इतनी पूर्ण होना
कि किसी के आने से ज़िंदगी और खूबसूरत हो जाए,
लेकिन किसी के चले जाने से
तुम्हारी दुनिया अधूरी न हो।
कमल-सी कोमल होना,
पर काली-सी तेज़ भी,
दिल में ममता रखना,
पर अपने हक़ के लिए
आवाज़ उठाना भी जानना।
तुम लड़की होना,
मगर अपने माँ-बाप के लिए
बेटा बनकर भी जीना,
उनके सपनों का सहारा बनना,
उनके बुढ़ापे की लाठी बनना।
तुम्हारे हाथों में चूड़ियाँ भी हों,
और उन्हीं हाथों में
अपने भविष्य की कमान भी।
तुम्हारे चेहरे पर सिंगार हो,
आँखों में सपने हों,
दिल में संस्कार हों,
और आत्मा में इतना साहस कि
ज़िंदगी चाहे जितनी बार गिराए,
तुम हर बार उठकर कहो,
“मैं किसी की ज़रूरत बनकर नहीं,
अपनी पहचान बनकर जीऊँगी।
मैं किसी की आधी कहानी नहीं,
मैं स्वयं में एक पूरी स्त्री हूँ।”
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अनीशा जी की एक सशक्त रचना… जो स्त्री को समर्पित है।बहुत ही सुन्दर रचना