24 वर्षों की प्रवासी साहित्य यात्रा को मिली काव्यात्मक अभिव्यक्ति

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे
नई दिल्ली। विदेश की धरती पर रहकर अपनी भाषा, संस्कृति और स्मृतियों से जुड़े रहना अपने आप में एक रचनात्मक यात्रा है। प्रवासी भारतीय साहित्यकार एवं संपादक शालिनी वर्मा की साहित्यिक यात्रा इसी जुड़ाव की कहानी कहती है। पिछले 24 वर्षों से दोहा, कतर में रह रहीं शालिनी वर्मा ने हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति को अपनी रचनात्मक गतिविधियों का केंद्र बनाया है। अब उनके इसी अनुभव और संवेदनात्मक संसार को उनके नए काव्य संग्रह ‘धीरे-धीरे उजाला’ में शब्द मिले हैं।
शालिनी वर्मा के इस काव्य संग्रह का लोकार्पण 12 अगस्त 2026 को नई दिल्ली स्थित प्रवासी भवन में हुआ। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद (ARSP) एवं वैश्विक हिंदी परिवार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित समारोह में देश-विदेश के साहित्यकारों, शिक्षाविदों और हिंदीसेवियों ने भाग लिया।

उत्तर प्रदेश के अतरौली, अलीगढ़ की मूल निवासी शालिनी वर्मा का साहित्यिक जीवन केवल लेखन तक सीमित नहीं रहा है। दोहा में रहते हुए उन्होंने हिंदी को भारतीय संस्कृति की संवाहक भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए अनेक साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्हें कतर की प्रथम हिंदी अंतर्जाल पत्रिका ‘नवचेतना अंतरराष्ट्रीय पत्रिका’ के आरंभ का गौरव भी प्राप्त है।
ऐसे समय में जब प्रवासी जीवन अक्सर अपनी जड़ों से दूरी की कहानी के रूप में देखा जाता है, शालिनी वर्मा का लेखन भाषा और स्मृति के जरिए अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रहने का अनुभव सामने रखता है। ‘धीरे-धीरे उजाला’ इसी अनुभव का काव्यात्मक विस्तार दिखाई देता है। संग्रह में संवेदना, स्मृति, जीवनानुभव और उम्मीद जैसे भाव प्रमुख रूप से उभरते हैं।
समारोह की अध्यक्षता पूर्व राजनयिक एवं भाषाविद् डॉ. विमलेश कांति वर्मा ने की। विशिष्ट अतिथि डॉ. बी.आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय के अधिष्ठाता प्रो. सत्यकेतु सांकृत ने पुस्तक पर अपने विचार रखते हुए कहा कि शालिनी वर्मा की कविताएँ कम शब्दों में गहरी संवेदनाओं और व्यापक जीवनानुभवों को अभिव्यक्त करती हैं।

कार्यक्रम का शुभारंभ वैश्विक हिंदी परिवार के मानद निदेशक श्री विनयशील चतुर्वेदी के स्वागत उद्बोधन से हुआ। मंच का संचालन लोकसभा सचिवालय के संयुक्त निदेशक श्री रणविजय राव ने किया।
समारोह में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के कुलसचिव एवं प्रख्यात कवि प्रो. जितेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, दिल्ली कौशल एवं उद्यमिता विश्वविद्यालय के सहायक कुलसचिव डॉ. संतोष पटेल, हिंदी अकादमी के पूर्व उपसचिव श्री ऋषि कुमार शर्मा, डॉ. राजेश माँझी, दिल्ली विश्वविद्यालय की अतिथि प्राध्यापक डॉ. दीप्ति अग्रवाल, वैश्विक हिंदी परिवार के अध्यक्ष श्री अनिल शर्मा जोशी तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग परिषद के मानद निदेशक श्री नारायण कुमार सहित अनेक साहित्यकार एवं विद्वान उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में विदेशों से भी हिंदी के विद्वान ऑनलाइन माध्यम से जुड़े। चीन से डॉ. विवेक मणि त्रिपाठी, सिंगापुर से श्रीमती आराधना झा श्रीवास्तव तथा नीदरलैंड्स से डॉ. ऋतु शर्मा नंदन ने अपनी सहभागिता दर्ज कराई। इससे यह आयोजन केवल पुस्तक लोकार्पण तक सीमित न रहकर वैश्विक हिंदी समुदाय के साहित्यिक संवाद का मंच भी बन गया।
इस अवसर पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के निदेशक श्री सुनील कुमार सिंह, डॉ. बी.आर. आंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के प्राध्यापक डॉ. महेंद्र प्रजापति, टेक्निया इंस्टीट्यूट (TIAS) की प्राध्यापक डॉ. नूपुर जैन, बड़ौत जैन कॉलेज की प्राध्यापक डॉ. नमिता जैन, आकाशवाणी दिल्ली के पूर्व प्रोग्राम ऑफिसर अरुण पासवान, रेलवे बोर्ड के पूर्व निदेशक (राजभाषा) डॉ. वरुण कुमार, प्रवासी संसार के संपादक डॉ. राकेश पाण्डेय, ईआईएल के पदाधिकारी शिवलखन मांझी, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुवाद अधिकारी सिद्धार्थ साहू, भारतीय जीवन बीमा निगम के सत्येन्द्र मांझी, लेखिका आशमा कौल, कवि एवं शिक्षक मनोज श्रीवास्तव ‘अनाम’, चित्रकार हर्षवर्धन आर्य, पत्रकार एवं कवि डॉ. जनार्दन यादव, डॉ. मनीष कुमार, प्रखर शर्मा और अमित पटेल सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे।
‘धीरे-धीरे उजाला’ का महत्व इस बात में भी देखा जा सकता है कि इसकी कविताएँ प्रवासी अनुभव को केवल भौगोलिक दूरी के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि स्मृतियों, रिश्तों, संवेदनाओं और अपनी भाषा से बने उस भावनात्मक संसार को सामने लाती हैं, जो व्यक्ति के साथ देश से बाहर भी चलता रहता है।
संग्रह का शीर्षक भी इसी भावभूमि की ओर संकेत करता है। ‘धीरे-धीरे उजाला’ जीवन में उम्मीद के उस प्रकाश का प्रतीक बनता है जो कठिनाइयों, दूरी और समय के बीच धीरे-धीरे अपना रास्ता बनाता है। शालिनी वर्मा के लिए हिंदी केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी जड़ों और सांस्कृतिक स्मृतियों से संवाद का माध्यम भी रही है।
इस दृष्टि से ‘धीरे-धीरे उजाला’ का लोकार्पण एक पुस्तक के प्रकाशन से आगे बढ़कर उस साहित्यिक यात्रा का उत्सव बन गया, जिसमें प्रवासी जीवन, हिंदी भाषा और भारतीय सांस्कृतिक चेतना एक-दूसरे से संवाद करती दिखाई देती हैं।
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हार्दिक बधाई शालिनी जी,
आवरण पृष्ठ व पुस्तक का नाम ही अपने आप में सशक्त रचनाओं का आभास दे रहा है। समस्त शुभकामनाएंँ