
सोनिया सोनम अक्स, पानीपत (हरियाणा)
मुझसे मेरा मन बंजारा,
अक्सर ही ये प्रश्न उठाता।
क्यों रहता शक के घेरे में,
माटी से माटी का नाता।
मेरी पथराई आँखों में,
अंतस के झरने फूटे हैं।
क़तरा-क़तरा क़तरा होकर,
मेरे अधरों पर उतरे हैं।
प्यास हुई परिभाषित लेकिन,
अधरों के कंपन झुलसे हैं।
आशाओं की आकुलता को,
सन्नाटा कैसे समझाता……
साँसें अटकी, सरगम भटकी,
तितर-बितर सब स्वर प्राणों के।
पिघल रहा आहों का लावा,
धुआँ-धुआँ तन अंगारों के।
अपनी आग बुझाने में ही,
सूख गए दरिया आँखों के।
पीर पराई हो जाए तो,
कौन उठाकर सावन लाता….
काम-वासना के फेरे में,
भोग रहे जर्जर जीवन हैं।
फेंट रहे अंतस की भाषा,
भरे गले तक कलुषित मन हैं।
खुद ही क़ैदी, ख़ुद के पिंजरे,
मुट्ठी भर सबके आँगन हैं।
गूँगे पूछ रहे बहरों से,
कौन है किसका भाग्य-विधाता….

वाह