समर्पण से आत्मविश्वास तक: एक स्त्री के संघर्ष और पुनर्जन्म की कहानी

भावना टंडन सिन्हा, लखनऊ
आज से पैंतीस साल पहले मैंने शौक-शौक में एक विद्यालय में छोटे बच्चों को पढ़ाना शुरू किया था। पढ़ाते-पढ़ाते एवं उनकी काउंसलिंग करते हुए न जाने कब यह शौक मेरी ज़रूरत और ऐसी प्यास बन गया कि मेरे दिन-रात उसी को समर्पित हो गए। बच्चों एवं उनके अभिभावकों को सही मार्गदर्शन देना, उन्हें निरंतर सकारात्मक एवं रचनात्मक दिशा में बढ़ने के लिए प्रेरित करना ही मेरा उद्देश्य बन गया।
अपने काम के साथ मैंने कभी समझौता नहीं किया और स्वयं को अधिक परिपक्व बनाने के लिए बी.एड. किया। सरकारी नौकरी भी प्राप्त की, परंतु विधि का विधान कुछ और ही था। जीवन के उतार-चढ़ाव और शादी के बाद की जिम्मेदारियों ने मेरी सोच बदल दी। अब परिवार, उसके संस्कार और उसकी ज़रूरतें सर्वोपरि हो गईं।
कठिन था स्वयं को इस तरह मसल देना, पर जब आप ऐसी लड़ाई लड़ते हैं, जहाँ दोनों तरफ आप ही होते हैं, तब निर्णय स्वयं को सर्वोपरि रखकर नहीं लिया जाता। कुछ ऐसा ही मैंने किया। स्वयं को हारकर सबको जीत लिया और अपनी अधूरी प्यास को एक नया कलेवर दे दिया।
परिवार के तीन बुजुर्ग, जो तीन अलग-अलग मानसिक बीमारियों से ग्रस्त थे, उनकी सेवा करते-करते बीस वर्ष निकल गए। इस दौरान मैं स्वयं को पूरी तरह भूल गई थी। घर की चारदीवारी ने कहीं-न-कहीं मेरे आत्मविश्वास को भी कमजोर कर दिया था। मानसिक कमजोरी मुझ पर धीरे-धीरे हावी होती जा रही थी, पर उस समय मैं स्वयं के प्रति जागरूक नहीं थी। सब कुछ समझते हुए भी यह नहीं समझ पा रही थी कि मन में उठती भावनाओं को दबाकर, स्वयं को अनदेखा कर, आखिर कब तक जीवन को सहज रखा जा सकता है।सन् 2025 के आसपास पहली बार यह विचार मन में गहराई से उतरा कि स्वयं को अभिव्यक्त करना भी उतना ही आवश्यक है, जितना दूसरों के लिए जीना। अपने मन की बात कहना, अपनी भावनाओं को शब्द देना—यह आत्मसम्मान की पहली सीढ़ी है। बाद में डॉक्टर ने भी यही सलाह दी। फिर सुरेखा दीदी से हुई एक आत्मीय बातचीत ने जैसे भीतर जमी वर्षों की चुप्पी को बहा दिया। मानो मन पर छाए बादल बरसकर हल्के हो गए।उसके बाद मैंने स्वयं को नए सिरे से गढ़ना शुरू किया। समय के साथ चलना सीखा, नई तकनीकों और गैजेट्स का उपयोग करना सीखा और सबसे महत्वपूर्ण—अपने लिए भी जीना सीखा।
परिवार के प्रति मेरी सकारात्मक सोच और संतुलित दृष्टिकोण ने आसपास के लोगों को भी यह विश्वास दिलाया कि मर्यादा, धैर्य और विश्वास के साथ रिश्तों को सहजता से निभाया जा सकता है। सभी संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास आज भी जारी है, किंतु आज मेरी सोच, मेरी भावना और मेरा आत्मविश्वास पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ है।
अब एक नई ऊर्जा, नई प्यास और नए विश्वास के साथ मैं जीवन-रूपी दरिया में गोते लगाते हुए निरंतर आगे बढ़ रही हूँ।
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