अधूरी मुलाक़ात

42 साल बाद अपनी बचपन की सहेली के घर पहुँची महिला का भावुक क्षण कुछ दोस्त बिछड़ जाते हैं, लेकिन उनकी यादें कभी साथ नहीं छोड़तीं।

भगवती गौड़

आज 42 वर्ष बाद मैं अपने पुराने शहर खड़गपुर स्टेशन पहुँची।

ऑटो करके मैं शीघ्रातिशीघ्र अपनी सहेली सविता नायर के घर पहुँचना चाहती थी, जिससे जीवन की व्यस्तताओं में कई दशक बीत जाने के बाद भी मिलना नहीं हो पाया था।

ऑटो की रफ्तार के साथ मेरे विचार भी तालमेल बिठा रहे थे। स्कूल साथ जाना, बेंच पर अगल-बगल बैठना, टिफ़िन में उसका मेरे डिब्बे का परांठा-अचार खाना और मेरा उसकी इडली-चटनी बड़े शौक से खाना, शाम को गार्डन में पोशम्पा खेलना—सब कुछ दिमाग में उथल-पुथल मचा रहा था। फिर हायर सेकेंडरी के बाद मजबूरी में अलग-अलग कॉलेजों में जाना पड़ा और उसके बाद शहरों के बदल जाने से हम एक-दूसरे से दूर हो गए।

तभी ऑटो वाले ने पूछा, “मैडम, जगह तो आ गई, अब कहाँ जाना है?”

आधुनिकीकरण के कारण मेरे दिमाग में जो शहर बसा था, वह अब पूरी तरह बदल चुका था। फिर मैं ऑटो से उतरकर किसी से उसके भाई के घर का पता पूछने लगी। तभी अचानक मुझे लगा, जैसे बारह वर्ष की सविता उसी घर के सामने खेल रही हो। मैं अनायास ही उस ओर बढ़ गई और मन ही मन उससे बोली, “चलो, तुम्हारे घर चलते हैं।”

वहाँ पहुँचकर मैंने बाहर से आवाज़ लगाई, “सविता डियर, बाहर आओ… तुम्हारे लिए एक सरप्राइज़ है।”

मेरी आवाज़ सुनकर उसके भाई और भाभी बाहर आए। उन्होंने पूछा, “आप कौन हैं?”

मैंने कहा, “मैं सविता की अभिन्न मित्र हूँ। उसे बुलाइए न, मैं बहुत दूर से आई हूँ।”

उनकी आँखें भर आईं। धीमे स्वर में उन्होंने कहा, “तुम जितनी दूर से आई हो, उससे कहीं ज़्यादा दूर हमारी बहन जा चुकी है… 2015 में ब्रेन ट्यूमर के कारण वह हमें हमेशा के लिए छोड़ गई।”

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