
डॉ. संजुला सिंह संजू
मित्रता ईश्वर का दिया हुआ एक अनमोल उपहार (वरदान) है।
यह हमारे जीवन का वह अमूल्य उपहार है, जो मनुष्य के सुख-दुःख को समान भाव से बाँटने की क्षमता रखता है। एक सच्चा मित्र केवल साथ चलने वाला व्यक्ति ही नहीं होता, बल्कि वह वह होता है जो विषम परिस्थितियों में भी हमारा हाथ थामे रखता है।सच्ची मित्रता किसी स्वार्थ, धन, जाति, पद या प्रतिष्ठा की मोहताज नहीं होती। यह तो निष्ठा, विश्वास, प्रेम, त्याग, समर्पण और आत्मीयता की मजबूत नींव पर टिकी होती है।
वैसे तो हमारे जीवन की राहों में अनेक लोग मिलते हैं, परंतु उनमें से सभी हमारे मित्र नहीं बन पाते। हमारा सच्चा मित्र वही होता है, जो हमारी कमियों को हमारे सामने बताकर उन्हें दूर करने के लिए प्रेरित करे और हर हाल में उन्हें दूर करने में सहायक सिद्ध हो।एक सच्चे मित्र को कभी भी अपने मित्र की उन्नति और प्रगति देखकर ईर्ष्या या द्वेष नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे अपने मित्र की सफलता देखकर प्रसन्न होना चाहिए।
एक सच्चा मित्र हमेशा अपने मित्र की पीड़ा को बिना बताए ही समझने की क्षमता रखता है। वह अपने मित्र की आँखों से बहते आँसुओं को देखकर भली-भाँति जान लेता है कि ये आँसू खुशी के हैं या गम के।इतिहास और साहित्य में श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता इसका सर्वोत्तम और जीवंत उदाहरण है। उनकी मित्रता से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चे मित्र के लिए धन-दौलत का नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण का महत्व होता है। एक अच्छा और सच्चा मित्र हमारे व्यक्तित्व को निखारता और संवारता है। वह हमें सदैव सही मार्ग दिखाता है तथा हमारे जीवन को आशा, उत्साह और आत्मविश्वास से भर देता है। परंतु आज के इस कलियुगी दौर में कुछ लोगों ने मित्रता की परिभाषा ही बदल दी है।
आज की मित्रता में कई स्थानों पर स्वार्थ, लोभ-लालच, ईर्ष्या और द्वेष का प्रभाव दिखाई देता है, जिसके कारण मित्रता का पवित्र रिश्ता कहीं-न-कहीं कलंकित और शर्मसार हो रहा है। यह अत्यंत निंदनीय और दुखद स्थिति है।
अंततः हम कह सकते हैं कि मित्रता ईश्वर का दिया हुआ एक अमूल्य वरदान है। इसे सच्चाई, विश्वास, सम्मान और निःस्वार्थ प्रेम के साथ संजोकर रखना चाहिए।
