राधाकृष्ण: दो नहीं, एक भी नहीं

पूर्णिमा की रात वृंदावन के वातावरण में बांसुरी लिए कृष्ण और उनके सामने भावपूर्ण मुद्रा में खड़ी राधा, आध्यात्मिक प्रेम और एकात्म का प्रतीकात्मक दृश्य।

देवश्री गोयल जगदलपुर

राधा जी ने…
एक दिन…
कृष्ण जी से पूछा…!
प्रेम क्या है?
तब कृष्ण ने कहा…
प्रेम में तुम और मै… नहीं होता राधे..
प्रेम तो
एकात्म होता है…
जब तुम मैं हो जाऊं और…
मुझमें तुम दिखो…
वहीं पर प्रेम है!
राधाजी बोली
नहीं मधुसूदन…
मेरा मत …
कुछ और है…
तुम और मैं
एक दूजे में …
कैसे दिखेंगे?
क्योंकि तुम
सारी दुनिया का… ध्यान रखने वाले…
लीला रचने वाले नट नागर..
और मैं तुम्हें अपने ध्यान में…
धरने वाली…
तुम्हारी रची
लीला में…
रमने वाली…
तुम सबके
मन मोहना..
मैं तुम पर न्योछावर…
तुम बंशी बजैया
मैं तान मुग्धा…
तुम द्वारिकाधीश…
तुम जगदीश..
मैं राधा
अदनी सी बाला…
भला एक कहाँ हुये..?
मोहक अंदाज में…
चितचोर मुस्काये…
बोले राधा प्यारी…
तुम पर हो…जाऊं बलिहारी…
मन मोहन मैं तेरा…
रचता लीला…
तेरे लिए..
तुम बिन
राग नहीं…
तुम बिन
रास नहीं…
राधा बिन
कृष्ण आधा…
माना मिलन
में रही
सदा बाधा…
किन्तु पूर्ण चन्द्र
की रात्रि सी…
तुम और मैं
दो नहीं
एक भी नहीं…
कृष्ण और राधा नही…
राधाकृष्ण है सही…
समझी मेरी राधा…
इसलिए सबसे कहता..
बोलो राधेराधे…
बोलो राधेकृष्ण…

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6 thoughts on “राधाकृष्ण: दो नहीं, एक भी नहीं

  1. देव श्री गोयल जी की सात्विक आत्मिक प्रेम की लाजवाब कविता।राधे राधे

  2. हरे कृष्णा 💕💐
    बेहद खूबसूरत काव्य रचना 👌

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