दीद उसकी

खिड़की के पास बैठा उदास व्यक्ति, विरह और प्रतीक्षा के भाव दर्शाता दृश्य।

सीमा ‘नयन ‘

दीद उसकी आजकल होती नहीं,
यूँ कोई अच्छी कोई ग़ज़ल होती नहीं।

हर सहर लाती है इक मुश्किल नई,
शाम तक मुश्किल ये हल होती नहीं।

मीरा बन के विष न जब तक पीजिए,
प्रेम की पूजा सफल होती नहीं।

कृष्ण जबसे द्वारिकापति बन गये,
कौन है कि ब्रज में जो बेकल नहीं।

दहर-ए-फ़ानी में सिवाए मौत के,
चीज़ कोई भी अटल होती नहीं।

हम करें इज़हार, ये वाजिब कहाँ,
वो हैं कि उनसे पहल होती नहीं।

जिसको चाहा हो उसी को भूलना,
बात ये इतनी सरल होती नहीं।

एक सूरत बस वही दिल में, नयन
उसकी कोई भी बदल होती नहीं।

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