
डालन रॉय
समाज ने स्त्री को प्रेम करना तो सिखाया, पर स्वयं से प्रेम करना नहीं सिखाया।त्याग करना सिखाया,
पर आत्मसम्मान बचाना नहीं सिखाया।समर्पण सिखाया,पर सीमाएँ तय करना नहीं सिखाया।शायद यही कारण है कि सदियों से अनगिनत स्त्रियाँ संबंधों को बचाते-बचाते स्वयं को खोती चली गईं।वे प्रेम और आत्महीनता के बीच का अंतर नहीं समझ पाईं,
सहनशीलता और अन्याय सहने के बीच की रेखा पहचान नहीं पाईं।सभ्यता ने उन्हें इतना अधिक “दूसरों” के लिए जीना सिखाया किवे कई बार स्वयं के लिए जीना ही भूल गईं।मनुष्य की सभ्यता ने स्त्री को कभी पूरी तरह मनुष्य की तरह देखने का साहस नहीं किया.एक स्वतंत्र चेतना के रूप में उसकी पहचान स्वीकार नहीं की।
“पराया धन”
यह केवल एक वाक्य नहीं है। यह सदियों से स्त्री की चेतना पर रखा गया वह अदृश्य बोझ है, जिसने अनगिनत बेटियों को अपने ही घर में अस्थायी बना दिया। सोचिए एक बच्ची, जो उसी घर में जन्म लेती है,उसी आँगन में खेलती है,जिसकी हँसी से घर जीवंत होता है, उसी से धीरे-धीरे कहा जाने लगता है-“तुम्हें दूसरे घर जाना है…”“तुम पराया धन हो…”ये शब्द केवल भाषा नहीं होते, ये मनोवैज्ञानिक संरचनाएँ होते हैं। धीरे-धीरे लड़की के भीतर यह भावना बैठने लगती है कि उसका अपना कोई स्थायी केंद्र नहीं है। वह अपने ही जीवन में अतिथि की तरह जीने लगती है। मनुष्य केवल जैविक रूप से नहीं बनता, वह शब्दों से भी निर्मित होता है। और “पराया धन” जैसा शब्द एक लड़की के आत्मबोध को भीतर से चोट पहुँचाता है। क्योंकि जिसे बचपन से यह बताया जाए कि वह किसी और की संपत्ति है,वह स्वयं को स्वतंत्र चेतना के रूप में कैसे देख पाएगी? स्त्री स्वभावतः कमजोर नहीं होती।वह भावनात्मक रूप से अत्यंत गहरी होती है।वह संबंधों को केवल सामाजिक अनुबंध की तरह नहीं जीती,बल्कि उनमें अपनी आत्मा का निवेश करती है। समस्या तब शुरू होती है जब उसकी संवेदनशीलता को उसकी कमजोरी में बदल दिया जाता है। भारतीय समाज में बेटियों को प्रेम तो बहुत दिया जाता है,पर अक्सर वह प्रेम स्वतंत्रता से अधिक संरक्षण का रूप ले लेता है। उन्हें जीवन के लिए कम, विवाह के लिए अधिक तैयार किया जाता है।उनकी चेतना में बचपन से यह धारणा बो दी जाती है कि
जीवन का अंतिम लक्ष्य किसी घर में स्वीकार लिया जाना है।यहीं से भावनात्मक निर्भरता जन्म लेती है।स्त्री कई बार प्रेम को अपने अस्तित्व का केंद्र बना लेती है,क्योंकि उसे कभी यह सिखाया ही नहीं गया किवह अकेले भी पूर्ण हो सकती है।
Virginia Woolf ने कहा था कि स्त्री को अपने विकास के लिए “एक अपना कमरा” चाहिए।
वह कमरा केवल चार दीवारें नहीं था, वह मानसिक और बौद्धिक स्वतंत्रता का प्रतीक था। हमारी बेटियों को भी वही स्वतंत्रता चाहिए-सोचने की स्वतंत्रता,असहमति की स्वतंत्रता,निर्णय लेने की स्वतंत्रता, गलती करने और उससे सीखने की स्वतंत्रता।उन्हें यह मत सिखाइए कि “घर बचाना” ही उनका सबसे बड़ा धर्म है। उन्हें यह सिखाइए कि अन्याय पहचानना भी बुद्धिमत्ता है।
उन्हें यह मत कहिए-“तुम्हें दूसरे घर जाना है।”उन्हें यह कहिए “जहाँ भी जाओ, अपनी चेतना, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता को कभी मत खोना।” समाज ने स्त्री को उसके शरीर के प्रति अत्यधिक सजग बनाया,पर उसके विवेक के प्रति उतना जागृत नहीं किया। उसे दर्पण अधिक दिए गए, पुस्तकालय कम। उसे यह विश्वास दिलाया गया कि उसका मूल्य उसके चेहरे, शरीर और आकर्षण में है,जबकि इतिहास की सबसे प्रभावशाली स्त्रियाँ अपनी चेतना से महान बनीं। Savitribai Phule ने पत्थर खाकर भी शिक्षा नहीं छोड़ी ।Pandita Ramabai ने ज्ञान को स्त्री-मुक्ति का मार्ग माना।
Marie Curie ने प्रयोगशाला की निस्तब्धता में इतिहास बदल दिया।इन स्त्रियों ने अपने सौंदर्य से नहीं, अपने विचारों से दुनिया को प्रभावित किया।जिस स्त्री के भीतर भय कम होने लगता है,उसके भीतर स्वतंत्रता जन्म लेने लगती है।क्योंकि भयभीत मनुष्य कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता।बेटियों को यह सिखाना होगा कि वे किसी की दया पर जीवित रहने वाली प्राणी नहीं हैं। उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाइए, शारीरिक रूप से मजबूत बनाइए, मानसिक रूप से जागृत बनाइए।
उन्हें martial arts भी सिखाइए और दर्शन भी। उन्हें विज्ञान भी पढ़ाइए और कविता भी। उन्हें यह समझाइए कि प्रेम जीवन का एक सुंदर हिस्सा हो सकता है, पर जीवन का संपूर्ण अर्थ नहीं। Friedrich Nietzsche ने लिखा था-“जिसके पास जीने का कारण होता है, वह लगभग हर परिस्थिति सह सकता है। ” स्त्री का कारण केवल संबंध नहीं होना चाहिए।उसका अपना स्वप्न, अपना ज्ञान, अपनी रचनात्मकता और अपनी चेतना भी होनी चाहिए। भावनात्मक रूप से सबल होने का अर्थ कठोर हो जाना नहीं है।बल्कि इसका अर्थ है-संवेदनशील रहते हुए भी स्वयं को न खोना। प्रेम करना, पर आत्मसम्मान बचाकर। रिश्ते निभाना, पर अन्याय के साथ समझौता किए बिना।समाज को बेटियों को “बेचारी” बनाकर नहीं पालना चाहिए।
Victim mentality धीरे-धीरे व्यक्ति की चेतना को दुर्बल कर देती है।पीड़ा को समझना आवश्यक है,पर स्वयं को स्थायी पीड़ित मान लेना आत्मविनाश है।स्त्री को यह समझना होगा कि उसकी शक्ति केवल उसके आँसुओं में नहीं, उसके विवेक में भी है।
भारतीय दर्शन में “शक्ति” का अर्थ केवल युद्ध नहीं था। शक्ति का अर्थ था सृजन, धैर्य, चेतना और संतुलन।जब कोई लड़की अपने भीतर यह अनुभव करने लगती है कि वह किसी की संपत्ति नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है,तभी उसका वास्तविक उत्कर्ष आरंभ होता है। और शायद समाज की वास्तविक परिपक्वता भी उसी दिन शुरू होगी,
जब वह बेटियों को “पराया धन” नहीं, अपने समय की सबसे जागृत चेतना मानने लगेगा।
