
नवनीत कमल, जगदलपुर
कहूँ क्यों बात बिगड़ी है, बताने भी कहाँ जाऊँ,
कहीं परिताप है भारी, छिपाने भी कहाँ जाऊँ।
कहाँ किसको कहूँ अपना, यहाँ पर कौन है मेरा,
असीमित दर्द है मन में, दिखाने भी कहाँ जाऊँ।
जलाता जेठ का सूरज, लगा है आग बरसाने,
सभी हैं बालमन घर में, घुमाने भी कहाँ जाऊँ।
कलुषता खूब है मन में, दिखाई दे रहा सबको,
अहं का शीश ऊँचा है, झुकाने भी कहाँ जाऊँ।
जला है द्वेष में कोई, कहीं पर दंभ दिखता है,
शहर में आग है इतनी, जलाने भी कहाँ जाऊँ।
यहाँ पर दर्द है पसरा, बहुत बेचैन दिखते हैं,
सभी चुपचाप हैं ग़म में, हँसाने भी कहाँ जाऊँ।
निभाया भी नहीं तुमने, तुम्हारा प्रेम है झूठा,
गिरे खुद की नज़र में ही, उठाने भी कहाँ जाऊँ।
परिंदों ने कहा तरु से, तुम्हारा ही सहारा है,
नहीं दो बूँद पानी की, पिलाने भी कहाँ जाऊँ।
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