दर्द और अकेलेपन की भावना दर्शाती हिंदी कविता का भावनात्मक दृश्य

व्यथा

यह कविता मन के अनकहे दर्द, रिश्तों की टूटन, सामाजिक कलुषता और भीतर पसरे परिताप को संवेदनशील शब्दों में व्यक्त करती है। हर पंक्ति एक ऐसे मन की आवाज़ है जो कहना भी चाहता है और छिपाना भी।

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कभी-कभी गलतफ़हमी

कभी-कभी हमें भ्रम हो जाता है कि सामने वाला सच में प्यार करता है उसकी बातों में अपनापन दिखता है, इकरार के लम्हे भी सच्चे लगते हैं। वह गले लगकर समझने का दावा तो करता है, पर दुनिया के सामने वही समझ कमज़ोर पड़ जाती है और हमारी नासमझी गिनाई जाती है। मन जैसा चाहे वैसा प्यार दे भी दे, और इल्ज़ामों की बरसात भी उसी मन से कर दे तब रिश्ते बोझ बनते देर नहीं लगती।

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