
सुरेश परिहार, पुणे
कुछ रिश्ते नामों में नहीं बंधते. वे धीरे-धीरे हमारी जिंदगी में उतरते हैं और फिर हमारी आदत, हमारी समझ, हमारी ताक़त बन जाते हैं. ऐसे रिश्तों को परिभाषाओं की ज़रूरत नहीं होती. वे कभी दोस्त बन जाते हैं, तो कभी माँ की तरह बिना कहे हमारी हर तकल़ीफ पढ़ लेते हैं. कभी मां की तरह डांटते हैं, ऐसे लोगों से कुछ भी नहीं छिपाया जा सकता. वह सच्चे मार्गदर्शक होते हैं.
मेरी जिंदगी में भी एक ऐसा ही रिश्ता है. वह लड़की, जो मुझे हमेशा पार्थ कहकर बुलाती है. पहले-पहल जब उसने मुझे इस नाम से पुकारा, तो यह स़िर्फ एक संबोधन लगा. लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि उसके लिए यह केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक भाव है. एक अपनापन, एक विश्वास, एक जिम्मेदारी और शायद एक दुआ भी. श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को पार्थ कहकर पुकारते थे. पार्थ यानी पृथा पुत्रकुंती का बेटा. यह संबोधन केवल नाम नहीं था, बल्कि अर्जुन को उसकी शक्ति, उसके धर्म और उसके अस्तित्व का स्मरण कराने वाला शब्द था.
और शायद मेरी वह दोस्त भी मुझे पार्थ इसलिए कहती है, क्योंकि वह मेरे भीतर उस इंसान को देखती है, जिसे कई बार मैं खुद नहीं देख पाता.
वह बहुत भावुक है. छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ ढूँढ लेना उसे आता है. कभी बारिश की पहली बूंद, कभी चाय की भाप, कभी किसी पुराने गीत की दो पंक्तियाँ उसे हर चीज़ में जीवन दिखाई देता है. लेकिन उतनी ही जल्दी वह मायूस भी हो जाती है.
जब कभी कोई उसे अनदेखा कर देता है और उसकी बातों को हल्के में लेता है या अपने ही संसार में खो जाता है तब उसकी खामोशी बहुत कुछ कह जाती है. वह शिकायत कम करती है, महसूस ज्यादा करती है. उसका स्वभाव बिल्कुल उस दीपक जैसा है, जो खुद जलकर दूसरों को रोशनी देता है. सबको प्यार करना, सबकी फिक्र करना, हर टूटे हुए मन को संभाल लेनाजैसे यह उसकी आदत हो.
कभी-कभी वह मुझे समझाती है, डाँटती है, रास्ता दिखाती है. उस समय उसमें दोस्त कम और माँ ज्यादा दिखाई देती है.
और जब मैं जिंदगी में हार मानने लगता हूँ, तब वह बिल्कुल कृष्ण की तरह कहती है. पार्थ, तुम इतने कमजोर नहीं हो.
उसके मुँह से निकला पार्थ शब्द स़िर्फ कानों तक नहीं पहुँचता, भीतर तक उतर जाता है. जैसे कोई मुझे मेरी ही पहचान याद दिला रहा हो.
आज के समय में, जहाँ रिश्ते बहुत जल्दी थक जाते हैं, वहाँ उसका यूँ बिना शर्त साथ निभाना अलग लगता है. उसने कभी बड़े वादे नहीं किए, लेकिन इतना तो तय है कि हर मुश्किल समय में उसकी बातें मेरे भीतर हौसला बनकर खड़ी रहेंगी.
कई लोग जिंदगी में आते हैं, कुछ समय बिताते हैं और चले जाते हैं. लेकिन कुछ लोग हमारे भीतर घर बना लेते हैं.वह भी शायद उन्हीं लोगों में से एक है. शायद इसलिए उसका पाथ र्कहना मुझे इतना अपना लगता है. क्योंकि उस एक शब्द में दोस्ती भी है, चिंता भी अपनापन भी है और विश्वास भी.
और सच कहूँ तो…हर किसी की जिंदगी में एक ऐसा इंसान जरूर होना चाहिए, जो उसे उसके टूटने से पहले पुकार सके
सुनो पार्थ…
तुम अभी हारे नहीं हो.
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सुनो पार्थ तुमने अच्छा लिखा है तुममें एक लेखक बसता है
भावपूर्ण अभिव्यक्ति। अनुकरणीय
चिंता अपनापन और विश्वास यह शब्द ही नहीं जीवन का आधार है l
चिंता अपनापन और विश्वास यह शब्द ही नहीं जीवन का आधार है l
बहुत सुन्दर और आत्मीय 👍👌
अतुलनीय अद्भुत 👌👌👏👏
Bahut sundar
अति सुन्दर
बहुत सुंदर, भावपूर्ण सृजन