
मीनाक्षी पारिक, जयपुर
आज
भीड़ के बीच, शोर के पार,
एक अजीब-सी ख़ामोशी ने मुझे थामा
जैसे किसी ने भीतर से पुकारा हो,
“ठहरो… अब बाहर नहीं, भीतर चलो।”
मैं रुकी।
और पहली बार देखा
वह चेहरा,
जो आईनों में नहीं दिखता,
पर हर निर्णय के पीछे खड़ा रहता है।
वह मैं थी
पर वैसी नहीं, जैसी दुनिया ने गढ़ी,
न वैसी, जैसी रिश्तों ने ओढ़ा दी।
वह मैं थी
निखालिस सत्य की तरह,
निष्कलुष, निडर, और कहीं-कहीं टूटी हुई।
मैंने पूछा
“क्यों छुपी रही इतने वर्षों तक?”
वह मुस्कुराई
“तुम्हें फुर्सत ही कहाँ थी मुझसे मिलने की,
तुम तो हमेशा दूसरों की कहानियाँ जीती रहीं।”
उसकी आँखों में
सालों की अनकही थकान थी,
और शब्दों में
एक गहरा, स्थिर समुद्र।
“तुमने मुझे कब खोया?”
मैंने संकोच से पूछा।
वह बोली
“जिस दिन तुमने अपनी खामोशी को
दूसरों की स्वीकृति के लिए त्याग दिया,
जिस दिन तुम्हें अपने सच से ज़्यादा
लोगों की राय प्रिय लगने लगी
उसी दिन।”
मैं चुप रही
जैसे अपराधी अपने ही सामने खड़ा हो।
फिर उसने मेरा हाथ थामा
वह स्पर्श कठोर नहीं,
पर सत्य से भरा था।
“सुनो,” उसने कहा,
“जीवन कोई मंच नहीं,
जहाँ हर क्षण अभिनय करना हो।
यह तो एक नदी है—
जिसे बस बहना है,
अपने स्वभाव में, अपने वेग में।”
मैंने महसूस किया
भीतर कहीं जमी बर्फ़
धीरे-धीरे पिघल रही है।
वह फिर बोली
“तुमने हर बार खुद को टाला है,
हर बार खुद से भागी हो।
पर सत्य से भागना संभव नहीं,
वह तो तुम्हारे भीतर ही निवास करता है।”
उस क्षण
मेरे भीतर एक दीया जला
जिसकी लौ ने
सारे भ्रमों को जलाना शुरू किया।
मैंने पहली बार स्वीकारा
अपनी असफलताएँ,
अपने डर,
अपनी अधूरी इच्छाएँ।
और अजीब बात
जैसे ही स्वीकार किया,
वही बोझ हल्का हो गया।
वह मुस्कुराई—
अब उसकी आँखों में शांति थी।
“यही तो है मुलाक़ात का अर्थ,”
उसने कहा,
“जब तुम अपने आप से भागना छोड़ दो,
और खुद को अपनाना सीख लो।”
आज
मैं लौटी हूँ
पर वैसी नहीं, जैसी गई थी।
अब मेरे भीतर
कोई द्वंद्व नहीं,
कोई मुखौटा नहीं।
मैं हूँ
संपूर्ण नहीं,
पर सत्य।
और शायद
यही सबसे बड़ी प्राप्ति है
जब मनुष्य स्वयं से मिलकर
स्वयं को स्वीकार ले।
आज मिली मैं
खुद से, खुद की मुलाक़ात में,
और पाया
जिसे दुनिया भर में खोजती रही,
वह तो मेरे भीतर ही निवास करता था।।
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