
स्मृति मिश्रा, रीति
बेहद रंगीन महफ़िल थी,
बेहद खुशनुमा रात थी।
याद है तुम्हें वही हमारी,
पहली मुलाकात थी॥
मैं बार-बार कनखियों से
तुम्हें देख लेती थी।
वो रात मोहब्बत की हमें
मिली सौगात थी॥
तुम्हारे अनछुए एहसास से
मोम हो जाना मेरा।
नर्म-नर्म एहसास की मानो
हुई बरसात थी॥
तुमने करीब आकर मानो
हौले से कुछ कहा।
शर्म और झिझक वाली
इक हसीन रात थी॥
आँखों के इशारों से सब
कुछ बयाँ हो गया था।
अब ज़ुबां तक लाने की
सिर्फ मुश्किलात थी॥
करीब आ हौले से हम
दोनों ने इकरार किया।
हमारे ख़्वाब में अब हसीं
सितारों की रात थी॥
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